हत्या के मामले में भगोड़ा आरोपी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि अपराध करने के बाद फरार मात्र होने से दोष साबित नही हो जाता है.
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह टिप्पणी की है. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखने का आदेश दिया है. कोर्ट ने यह भी कहा कि यह साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 8 के तहत एक आचरण है, जो उसके दोषी मानसिकता की ओर इशारा करता है. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कहा और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है.
कोर्ट ने कहा कि एक निर्दोष व्यक्ति भी घटना के बाद घबरा सकता है और घबराहट में वह वहां से भाग भी सकता है. फरार होने का कृत्य निश्चित रूप से अन्य साक्ष्यों के साथ विचार किए जाने वाला प्रासंगिक साक्ष्य है. अदालत ने याचिकाकर्ता की हत्या के लिए दोषसिद्धि को यथावत रखा है. याचिकाकर्ता को घटना स्थल से फरार होने के अपीलकर्ता को आखिरी बार 10 जुलाई 2006 की रात को मृतक के साथ देखा गया था और अगले दिन फरार हो गया था.
22 जुलाई 2006 को उसकी गिरफ्तारी तक उसका पता नहीं चला. कोर्ट ने पाया कि उसने मृतक के ठिकाने के बारे में गलत जानकारी दी थी और मृतक के परिवार और दोस्तों को गुमराह किया था. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उदाहरण देते हुए लिखा है कि केवल फरार होना ही दोषी मानसिकता को नहीं दर्शाता है. कोर्ट ने कहा कि हत्या के लिए प्रयुक्त हथियार की बरामदगी और अपराध से इसे जोड़ने वाले फॉरेंसिक साक्ष्य के साथ-साथ इस आचरण ने अपराध की ओर इशारा करने वाली परिस्थितियों की एक श्रृंखला बनाई.
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