सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है. जस्टिस जे. बी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने मामले में जिस तरह से पारित किया, वह असामान्य और संक्षिप्त था.
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट को जमानत याचिका पर मेरिट के आधार पर निर्णय लेना चाहिए था. पुलिस से यह पूछना कि आरोपी को चार साल से गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया, न्यायिक प्रक्रिया का यह सही तरीका नहीं है. जबकि चार साल गिरफ्तार न करना अग्रिम जमानत देने का एक महत्वपूर्ण आधार है.
कोर्ट ने आरोपी को दिया अग्रिम जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत दे दिया है. कोर्ट ने अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि अगर उसे गिरफ्तार किया जाता है तो जांच अधिकारी द्वारा तय की गई शर्तों के आधार पर तुरंत जमानत पर रिहा किया जाए.
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि हाई कोर्ट को ऐसी याचिकाओं पर सीधे मेरिट पर निर्णय लेना चाहिए, न कि पुलिस को अनावश्यक सवाल भेजकर मामले को लंबा खींचना चाहिए. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उसे पहले यह विश्वास दिलाया गया कि उसके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है.
डिप्टी एसपी के सामने पेश होने का मिला था निर्देश
2021 में उसे निलंबित किया गया था, लेकिन 27 सितंबर 2023 को निलंबन कर फिर से सेवा में बहाल कर दिया गया. उसे गिरफ्तारी का डर तब लगा जब डिप्टी कमिश्नर ने एक पत्र भेजकर आर्थिक अपराध शाखा के डिप्टी एसपी के सामने पेश होने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब इस मामले में जिस सह-आरोपी पर वास्तव में रिश्वत लेने का आरोप है, उसे पहले ही हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल चुकी है. ऐसे में मुख्य याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार करना उचित नही है.
बता दें कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 2021 में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 और 7 A तथा आईपीसी की धारा 120B के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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