प्रयागराज: जगद्गुरु रामभद्राचार्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर दाखिल याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पुलिस शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं करती है, तो पीड़ित को सीधे हाईकोर्ट पहुंचने के बजाय पहले कानून में दिए गए वैधानिक विकल्पों का इस्तेमाल करना चाहिए.
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रमेश उपाध्याय की ओर से दाखिल आपराधिक विविध रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में जगद्गुरु रामभद्राचार्य की ओर से उपाध्याय समुदाय और कुछ धार्मिक व्यक्तित्वों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं. उनका कहना था कि इन टिप्पणियों से उनकी भावनाएं आहत हुईं और समुदाय के दूसरे लोगों पर भी इसका असर पड़ा.
वाराणसी पुलिस से की गई थी शिकायत
याचिकाकर्ता के मुताबिक उन्होंने इस मामले में वाराणसी के पुलिस आयुक्त के सामने शिकायत रखी थी और संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. जब पुलिस की ओर से एफआईआर दर्ज नहीं की गई तो उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया. सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने पहले संबंधित थाने या मजिस्ट्रेट के सामने कानून के मुताबिक कदम नहीं उठाया. सरकार ने यह भी बताया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शिकायत वास्तव में पुलिस को प्राप्त हुई थी.
मजिस्ट्रेट के पास जाने का विकल्प मौजूद
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज नहीं होने की स्थिति में कानून पीड़ित को आगे बढ़ने का रास्ता देता है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के पास आवेदन किया जा सकता है.
कोर्ट के मुताबिक मजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने के साथ-साथ मामले की जांच का निर्देश भी दे सकता है. जरूरत पड़ने पर जांच की निगरानी भी की जा सकती है. ऐसे में जब कानून में पहले से स्पष्ट उपाय मौजूद हैं, तो उन्हें अपनाए बिना सीधे संवैधानिक अधिकार के तहत हाईकोर्ट पहुंचना उचित नहीं है.
हाईकोर्ट को पहला मंच नहीं बनाया जा सकता
अदालत ने कहा कि अगर हर मामले में उपलब्ध वैधानिक उपायों को छोड़कर लोग सीधे हाईकोर्ट आने लगें, तो संवैधानिक अदालत ही मामले की पहली सुनवाई का मंच बन जाएगी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती.
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के लिए आगे का रास्ता बंद नहीं किया है. हाईकोर्ट ने उन्हें कानून के तहत उपलब्ध उचित वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है. फिलहाल अदालत ने मौजूदा याचिका को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया.
यह आदेश 1 सितंबर 2026 को पारित किया गया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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