सीजेआई सूर्यकांत ने देशभर की अदालतों में न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक कमेटी का गठन किया है. उन्होंने ज्यूडीशियल इंफ्रास्ट्रक्चर एडवाइजरी कमेटी का गठन किया है. समिति का मुख्य उद्देश्य अदालतों की मौजूदा जरूरतों का आकलन कर न्यायपालिका के ढांचे को आधुनिक और सुदृढ़ बनाने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार करना है. गठित समिति की अध्यक्षता जस्टिस अरविंद कुमार करेंगे.
इनके अलावा कोलकाता हाई कोर्ट के जस्टिस देबंगसू बसक, पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा, बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के महानिदेशक शामिल हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट के महासचिव समिति के सदस्य सचिव की भूमिका निभाएंगे.
फंड आवंटन का खाका और अंतरिम रिपोर्ट
समिति देशभर की अदालतों के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक संसाधनों और सुविधाओं का आकलन करेगी. इसके तहत अदालत परिसरों का विकास, आधुनिक सुविधाओं के विस्तार और न्यायिक कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए 40000 से 50000 करोड़ रुपए तक के फंड आवंटन का खाका तैयार किया जाएगा. सीजेआई सूर्यकांत ने गठित समिति को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 31 अगस्त तक का निर्देश दिया है.
बुनियादी ढांचे पर सीजेआई के विचार
बता दें कि हैदराबाद में तेलंगाना हाई कोर्ट के जोन 2 की आधारशिला रखते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि उन्हें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, असम और तेलंगाना सहित कई राज्यों में न्यायिक आधारशिला रखने का सौभाग्य मिला है. सीजेआई ने कहा था कि राजनीतिक विचारधाराओं से परे सभी राज्य सरकारों ने यह स्वीकार किया कि न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका का उद्देश्य एक हो जाता है तो संविधान वास्तव में जीवंत हो उठता है. आज हम यहां ठीक यही देख रहे हैं.
सरकारी दावों की खुली पोल और मुकदमों पर खर्च
सरकार द्वारा गठित समिति ने सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है. समिति की मानें तो देश में कई ऐसी अदालतें हैं जहां पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 साल में मुकदमे लड़ने पर 400 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है. जबकि 2023-24 में मुकदमेबाजी पर केंद्र सरकार का 66 करोड़ रुपए खर्च हो चुका है. जबकि 2022-2023 में 9 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुका है.
ये भी पढ़ें: दिल्ली में जजों की सुरक्षा पर हाई कोर्ट सख्त, पुलिस से हलफनामा मांग कर लगाई फटकार
करोड़ों मुकदमे लंबित, जजों की कमी मुख्य कारण
बता दें कि देशभर की अदालतों में 5.4 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं. इनमें से 60 लाख ऐसे मामले हैं जो 10 साल से अधिक समय से लंबित हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में 11.3 लाख मामले लंबित हैं. वहीं राजस्थान हाई कोर्ट में 6.8 लाख, महाराष्ट्र हाई कोर्ट में 6.6 लाख और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 4.8 लाख मुकदमे लंबित हैं. हालांकि मुकदमे लंबित होने का एक कारण जजों की कमी भी बताया जाता है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



