देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने संविधान को भारत का एक ‘साझा घर’ बताया है. उन्होंने कहा कि संविधान सिर्फ एक कानूनी किताब या अधिकारों का चार्टर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा घर है जो हर नागरिक को अपनत्व का अहसास कराता है. सीजेआई सूर्यकांत वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की नई किताब “The Constitution Is My Home: Conversations on a Life in Law” के विमोचन समारोह में बोल रहे थे. इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुलकर अपने विचार रखे.
संविधान एक इमारत नहीं, यादों और उम्मीदों का ढांचा है
मुख्य न्यायाधीश ने घर का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई घर सिर्फ ईंट और पत्थरों से नहीं बनता, बल्कि वह यादों, सपनों और अपनेपन से जुड़कर बनता है, ठीक वैसे ही हमारा संविधान भी है. यह हमें पीढ़ियों से मिली एक अनमोल विरासत है. देश की हर पीढ़ी अपनी जरूरतों के हिसाब से इसे और मजबूत बनाती है. उन्होंने कहा कि समय के साथ समाज की जरूरतें बदली हैं और संविधान ने भी नए विचारों को अपनाया है, लेकिन इसकी मूल आत्मा हमेशा सुरक्षित रही है. यह केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर आम आदमी के जीवन से जुड़ा है.
मनमानी ताकत को रोकने के लिए ‘चेक एंड बैलेंस’ जरूरी
सीजेआई सूर्यकांत ने साफ कहा कि सिर्फ एक लिखित संविधान होना ही किसी देश के लिए काफी नहीं होता. असली लोकतंत्र वह है जहां सरकार की ताकत पर संतुलन, जवाबदेही और पारदर्शिता हो. उन्होंने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं को पता था कि मनमानी सत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है. इसलिए उन्होंने ‘चेक एंड बैलेंस’ यानी संतुलन की एक ऐसी व्यवस्था बनाई, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करती है. उन्होंने केशवानंद भारती और मेनका गांधी जैसे ऐतिहासिक फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फैसलों ने साबित किया कि देश के कुछ बुनियादी मूल्य किसी भी राजनीतिक दबाव से ऊपर होते हैं.
‘कोर्ट और वकील दोनों हैं संविधान के विकास में साझेदार’
अपने संबोधन में मुख्य न्यायाधीश ने वकीलों और न्यायपालिका के रिश्ते को बहुत महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि संविधान को आगे बढ़ाने में दोनों की बराबर की साझेदारी है. अदालत में वकीलों द्वारा की जाने वाली बहस और तर्कों से ही बड़े-बड़े कानूनी सिद्धांत जन्म लेते हैं, जो बाद में देश का कानून बनते हैं. जनहित याचिका (PIL) ने भी देश के लोकतंत्र को ज्यादा मजबूत और आम लोगों के प्रति जवाबदेह बनाया है.
‘हम सभी इस घर के किराएदार और रखवाले हैं’
कार्यक्रम के अंत में सीजेआई ने कहा कि संविधान किसी एक संस्था, जज या वकील का नहीं है. यह शहर, गांव और समाज के सबसे पिछड़े व्यक्ति का भी साझा घर है. हम सब इस घर में रहने वाले लोग हैं और इसके अस्थायी रखवाले भी हैं. हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें. उन्होंने इंदिरा जयसिंह को बधाई देते हुए कहा कि उनकी यह किताब नए और पुराने वकीलों को याद दिलाती है कि वकालत सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि न्याय और संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा का संकल्प है.
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