दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के को लेकर बड़ा आदेश दिया है. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक क्रूरता जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन बनाए रखने पर जोड़ दिया है. जस्टिस अजय दिगपॉल ने यह आदेश दिया है.
दहेज उत्पीड़न समाज के लिए महामारी
कोर्ट ने कहा कि एक ओर जहां ऐसे अपराध समाज के लिए महामारी है और इनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए. वहीं दूसरी ओर निर्दोष व्यक्तियों के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए, जो अक्सर दूर के रिश्ते के चलते बिना ठोस आरोपों के मुकदमों में घसीट लिए जाए हैं. दायर याचिका में दहेज उत्पीड़न, क्रूरता और उत्पीड़न के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी. एफआईआर में उसके ऊपर आरोप था कि उसने कथित तौर पर शिकायतकर्ता के घर में सीसीटीवी कैमरे तोड़े और फर्नीचर में ताले लगाए.
एफआईआर रद्द करने पर आपत्ति नहीं
कोर्ट ने कहा दहेज उत्पीड़न जैसी बुराइयों से समाज को मुक्त करने के प्रयासों को निर्दोष व्यक्तियों के अधिकारों को संतुलित किया जाना चाहिए. मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील देते हुए कहा कि भतीजी के खिलाफ एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है. क्योंकि घटना के समय वह मात्र 18 वर्ष की थी, स्कूल में पढ़ती थी और अपने पिता के निधन से मानसिक आघात में थी.
कोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए कहा कि भतीजी के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर नहीं हैं. इसलिए आईपीसी की धारा 498 A, 406 और 34 के तहत दर्ज एफआईआर और उससे संबंधित सभी कार्यवाही को उसकी सीमा तक रद्द किया जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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