उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर कथित अतिक्रमण और कब्जे से जुड़े मामले की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल टाल दिया है, लेकिन अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष इस मामले को उठाया गया. सुनवाई के दौरान रेलवे और याचिकाकर्ता दोनों पक्षों की ओर से मामले में त्वरित (जल्द) सुनवाई की मांग की गई.
गौला नदी का पानी ट्रैक पर आने से नुकसान
मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से पेश हुए वकील ने कोर्ट को अवगत कराया कि इस मामले में तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है, क्योंकि गौला नदी का पानी बहकर रेलवे ट्रैक पर आ गया है, जिसके कारण रेलवे संपत्ति को भारी नुकसान पहुंच रहा है.
इससे पहले की सुनवाइयों में रेलवे की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया था कि रेलवे और सरकार की जमीनों की सही पहचान कर ली गई है. रेलवे का कहना है कि वह वहां ‘वंदे भारत’ ट्रेन चलाना चाहता है, जिसके लिए रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म को विस्तार देने की सख्त जरूरत है. रेलवे ने यह भी कहा था कि वह प्रभावित लोगों को मुआवजा देने के लिए भी तैयार है, इसलिए जमीन को जल्द खाली कराया जाए.
उत्तराखंड सरकार का रुख
राज्य सरकार ने पूर्व में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि केंद्र सरकार के साथ संयुक्त बैठक आयोजित कर विस्तृत सर्वेक्षण किया गया है.
पहचान किए गए परिवार: सर्वे के दौरान लगभग साढ़े चार हजार (4,365) परिवारों की पहचान की गई है, जिनमें कुल करीब 50 हजार लोग निवास करते हैं.
पुनर्वास योजना: विस्थापित होने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा अब तक 40 हेक्टेयर भूमि की पहचान कर ली गई है और पुनर्वास नीति पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.
अदालत के क्या निर्देश दिए?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव, केंद्र सरकार और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को आपस में बैठक कर यह ठोस योजना बनाने का निर्देश दिया था कि इन लोगों का पुनर्वास किस प्रकार किया जाएगा. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि वन क्षेत्र (Forest Area) को छोड़कर अन्य वैकल्पिक जमीनों पर पुनर्वास के विकल्प तलाशे जाने चाहिए.
नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश को दी गई है चुनौती
यह पूरा कानूनी विवाद नैनीताल उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है, जिसमें अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाइयों में अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि रेलवे ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है; यदि लोगों को बेदखल करना है तो उचित नोटिस जारी किए जाएं, जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से ऐसा नहीं किया जा सकता.
चूंकि 2023 के अंतरिम आदेश में संशोधन के लिए अर्जी दाखिल की गई है और रेलवे ट्रैक तथा हल्द्वानी स्टेशन की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की गई है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है.
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