कैश कांड के आरोपों से घिरे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को इस्तीफा दिए हुए एक महीना हो चुका है, लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अभी तक स्वीकार नहीं किया है. उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने के बाद उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया (महाभियोग) शुरू करने की तैयारी की जा रही है. चूँकि जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा तत्काल प्रभाव से दिया था, इसलिए कानूनी स्थिति को लेकर चर्चा बनी हुई है कि क्या इसे वापस लिया जा सकता है या महाभियोग की प्रक्रिया जारी रहेगी.
महाभियोग प्रस्ताव और जांच कमेटी का गठन
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही 14 मार्च 2025 को आवास पर भारी मात्रा में अधजले नोट मिलने के बाद शुरू हुई थी. अगस्त 2025 में, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षर वाले महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी दी. जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 की धारा 3(2) के तहत एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया गया है:
- अध्यक्ष: जस्टिस अरविंद कुमार (सुप्रीम कोर्ट के जज)
- सदस्य: जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव (मद्रास हाईकोर्ट के जज)
- सदस्य: बी. वी. आचार्य (वरिष्ठ वकील)
मामले की पृष्ठभूमि
बता दें कि 14 मार्च की रात को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास स्थित स्टोर रूम में आग लग गई थी, जिसके बुझाने के दौरान भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ था. इसके बाद सीजेआई संजीव खन्ना ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जांच के निर्देश दिए थे. रिपोर्ट मिलने के बाद कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर करने का प्रस्ताव भेजा था. साथ ही, सीजेआई ने मामले की जांच के लिए एक ‘इन-हाउस’ कमेटी का भी गठन किया था.
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जस्टिस वर्मा का पक्ष
जस्टिस वर्मा का कहना है कि उनके मामले में जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 में तय प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं किया गया है. दूसरी ओर, राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन द्वारा पूर्व में प्रस्ताव खारिज किए जाने और बाद में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच कमेटी गठित किए जाने से यह मामला और अधिक पेचीदा हो गया है.
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