अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर कर चुनावी वादों के वित्तीय प्रभाव, मुफ्त की रेवड़ियों पर रोक और घोषणापत्रों के लिए एक निश्चित प्रारूप लागू करने की मांग की है. (PC: भारत एक्सप्रेस)
Supreme Court: हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी को 22 साल बाद बरी कर दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बिना भरोसेमंद और ठोस सबूत के किसी व्यक्ति की जिंदगी के 22 साल जेल में बीत जाना न्याय व्यवस्था के लिए बहुत चिंताजनक है. जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे हत्या के दोषी अर्जुन उर्फ टुनटुन को बरी कर दिया है.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि,
हाई कोर्ट को जेल में दायर अपील में 3157 दिनों की देरी को सिर्फ तकनीकी आधार पर खारिज नहीं करना चाहिए था. ऐसे मामलों में अदालतों को उदार और सक्रिय रुख अपनाना चाहिए, क्योंकि मामला किसी व्यक्ति की आजादी से जुड़ा होता है. सुप्रीम कोर्ट ने जांच में कई खामियां भी बताई कि पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि संदेह सीधे अर्जुन जानी पर ही क्यों गया. एक गवाह ने स्वीकार किया कि पुलिस ने जानी को पीटकर कथित स्वीकारोक्ति कराई थी, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है.
पत्थरों पर खून के निशान नहीं
हत्या में इस्तेमाल बताए गए पत्थरों पर खून के निशान नहीं मिले. बरामदगी को लेकर भी गवाहों और जांच अधिकारी के बयानों में विरोधाभास था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन तभी जब वह विश्वसनीय, सुसंगत और अन्य परिस्थितियां से मेल खाने वाली हो. इस मामले में ऐसा नहीं था. ऐसे में संदेह का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए. इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि का फैसला रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया.
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि,
तीन महिलाओं की हत्या निश्चित रूप से गंभीर अपराध था, लेकिन केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर कथित थर्ड डिग्री तरीके से बयान दर्ज कर और कमजोर सबूतों के आधार पर उसे 22 साल जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. कोर्ट ने कोरापुट जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला प्रशासन को आरोपी के पुनर्वास की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया है.
-भारत एक्सप्रेस
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