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भ्रामक विज्ञापन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत निवारण तंत्र बनाने का दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भ्रामक विज्ञापनों पर निगरानी के लिए दो महीने के भीतर शिकायत निवारण तंत्र बनाने का निर्देश दिया, जिससे समाज को नुकसान से बचाया जा सके.

Supreme Court
Aarika Singh Edited by Aarika Singh

सुप्रीम कोर्ट भ्रामक विज्ञापन के मामले में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत निवारण तंत्र बनाने का निर्देश दिया है. जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि ऐसे विज्ञापन समाज के लिए बहुत नुकसान पहुचा सकते है, उन पर कड़ी निगरानी जरूरी है. राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को तंत्र स्थापित करने के लिए राज्यों को दो महीने का समय दिया है. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों को ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट 1954 के तहत प्रतिबंधित आपत्तिजनक विज्ञापनों के बारे में शिकायत दर्ज कराने के लिए एक तंत्र बनाने चाहिए.

कोर्ट ने राज्यों को 1954 अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन पर पुलिस तंत्र को संवेदनशील बनाने का निर्देश दिया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई 2024 को आदेश दिया था कि कोई भी विज्ञापन जारी करने से पहले केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 की तर्ज पर विज्ञापनदाताओं से स्व घोषणा प्राप्त की जाए. भ्रामक विज्ञापनों का यह मुद्दा तब उठा था जब सुप्रीम कोर्ट 2022 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पतंजलि और योग गुरु रामदेव द्वारा कोविड टीकाकरण अभियान और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के खिलाफ बदनाम करने का आरोप लगाया गया था.

भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं के भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर दिल्ली, आंध्रप्रदेश और जम्मू कश्मीर सहित अन्य राज्यों को आड़े हाथों लिया था. कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिव से पूछा था आदेश का पालन क्यों नही किया जा रहा है. कोर्ट एलोपैथिक दवाओं की लक्षित करने वाले भ्रामक दावों और विज्ञापनों को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है.

भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मुद्दा 2022 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा कोविड टीकाकरण अभियान और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाया था. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि आयुष मंत्रालय को भ्रामक विज्ञापनों पर दर्ज शिकायतों और उन पर हुई प्रगति के बारे में उपभोक्ताओं को विवरण उपलब्ध कराने के लिए एक डैशबोर्ड स्थापित करना चाहिए.

-भारत एक्सप्रेस



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