उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुई हैवानियत (दुष्कर्म) और निर्मम हत्या के अत्यंत दुखद व संवेदनशील मामले में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने पुलिस और निजी अस्पतालों के उदासीन रवैये पर बेहद तल्ख और कड़ी टिप्पणियां की हैं. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ इस मामले पर लगातार सुनवाई कर रही है.
मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को अवगत कराया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन में गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंप दी है. एएसजी ने बताया कि एसआईटी की प्राथमिक जांच के आधार पर संबंधित पुलिस थाने के थाना प्रभारी (SHO) के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करते हुए उनका तबादला पुलिस लाइन कर दिया गया है.
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा
“यह पुलिस और स्वास्थ्य व्यवस्था की घोर लापरवाही का अत्यंत गंभीर मामला है. हमने एसआईटी की सौंपे गए जांच रिपोर्ट का अवलोकन कर लिया है. अब दूसरे पक्ष की दलीलें सुनने के बाद हम इस मामले को अंतिम रूप से बंद करेंगे.”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील एन. हरिहरन ने अदालत से अनुरोध करते हुए कहा कि उन्हें एसआईटी की रिपोर्ट देखने की अनुमति दी जाए.
पहले केवल 15 दिन का था बैकअप
एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को एक अन्य महत्वपूर्ण सुधारत्मक कदम की जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व में संबंधित क्षेत्र में सीसीटीवी (CCTV) फुटेज का बैकअप केवल 15 दिनों के लिए ही सुरक्षित रखा जाता था. लेकिन अब एसआईटी द्वारा की गई महत्वपूर्ण सिफारिशों के बाद शासन द्वारा सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को कम से कम 6 महीने से अधिक समय तक सुरक्षित रखने का सख्त प्रशासनिक निर्देश जारी कर दिया गया है.
सीजेआई की तीखी फटकार
पिछली सुनवाई का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दो कथित निजी अस्पतालों की संवेदनहीनता पर कड़ा आक्रोश व्यक्त किया था. सीजेआई सूर्यकांत ने डॉक्टरों को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि यदि आप अपनी नैतिक और चिकित्सीय ड्यूटी ईमानदारी से नहीं निभा सकते हैं, तो आपको अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने का कोई नैतिक हक नहीं है. यदि आपमें जरा सी भी मानवीय संवेदनशीलता होती, तो अपने पास पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न होने पर भी आप उस गंभीर बच्ची को तुरंत किसी दूसरे बड़े अस्पताल में रेफर करते या पहुंचाते. क्या आपने उसे केवल इसलिए नजरअंदाज कर तड़पने के लिए छोड़ दिया क्योंकि वह गरीब थी और आपकी मोटी फीस नहीं दे सकती थी?”
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित निजी अस्पतालों को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि वे पीड़ित गरीब परिवार की आर्थिक मदद के लिए अपनी मर्जी से समुचित दान/मुआवजा दें, अन्यथा अदालत उन पर भारी वित्तीय जुर्माना (पेनाल्टी) लगाएगी.
IPS अधिकारी के नेतृत्व में बनी थी SIT
उल्लेखनीय है कि इस मामले में पूर्व की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को तत्काल एक पारदर्शी एसआईटी गठित करने का हुक्म दिया था. कोर्ट ने शर्त रखी थी कि एसआईटी में उत्तर प्रदेश कैडर की सीपी/आईजी (CP/IG) रैंक की एक ऐसी वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी को शामिल किया जाए जिसका गृह राज्य उत्तर प्रदेश न हो, साथ ही इसमें एसपी (SP) रैंक के एक अधिकारी और एक महिला डीएसपी या इंस्पेक्टर को रखा जाए.
सीजेआई सूर्यकांत ने इस पूरी घटना को झकझोरने वाला बताते हुए कहा था कि इस अपराध का सबसे चौंकाने वाला पहलू दो निजी अस्पतालों और स्थानीय पुलिस का पूरी तरह से अमानवीय, उदासीन और गैर-जिम्मेदाराना रवैया है.
घटना के एक दिन बाद दर्ज हुई थी FIR
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गंभीर आरोप लगाते हुए बताया था कि स्थानीय पुलिस अपनी लापरवाही छुपाने के लिए लगातार पीड़िता के असहाय पिता को ही प्रताड़ित और परेशान कर रही थी.
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उन्होंने कोर्ट को बताया था कि इतनी जघन्य घटना होने के बावजूद पुलिस ने एक दिन बाद विलंब से एफआईआर दर्ज की, जो साफ तौर पर पुलिस प्रशासन की आपराधिक लापरवाही और लीपापोती को दर्शाता है. अब एसआईटी रिपोर्ट के बाद कोर्ट इस मामले में अंतिम आदेश पारित करेगा.
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