राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में 20 अगस्त को भी सुनवाई जारी रहेगी. सीजेआई बी. आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई कर रही है. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई के अलावे जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल है. सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति द्वारा न्यायालय से राय लेना असंवैधानिक नही है.
तमिलनाडु मामले पर नहीं पड़ेगा असर
मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई बी. आर गवई ने कहा कि जब राष्ट्रपति ने खुद राय मांगी है तो इसमें दिक्कत क्या है? कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से पूछा कि क्या आप वाकई इसे चुनौती देना चाहते हैं? कोर्ट ने कहा कि वह केवल संदर्भ का उत्तर दे रहा है और इससे तमिलनाडु मामले में दिए गए फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा. सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील के के वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से उन फैसलों पर रोक लगाने को कहा जा रहा है, जो पहले ही तय हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 143 के दायरे से बाहर है, क्योंकि माननीय न्यायाधीश अनुच्छेद 143 के उस फैसले को नही छू सकते जो तय हो चुका है.
संविधान को फिर से लिखने की कोशिश?
सीजेआई ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने विधायी शक्तियों का अतिक्रमण किया है या संविधान को फिर से लिखने की प्रयास किया है, यही आपका मुख्य तर्क है? इसपर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि यह संविधान में पाठ्य संशोधन का मामला है, क्या व्याख्या के नाम पर न्यायालय यह कहने की हद तक जा सकता है कि मैं कलम और कागज लेकर संविधान को फिर से लिख दूंगा. संविधान पीठ केरल और तमिलनाडु सरकार द्वारा उठाए गए प्रारंभिक आपत्तियों पर सुनवाई कर रहा है. इन राज्यों ने राष्ट्रपति द्वारा न्यायालय द्वारा भेजे गए संदर्भ पर आपत्ति जताई है.
सीजेआई ने कहा कि हम यह तय नहीं कर रहे हैं कि तमिलनाडु का फैसला सही है या नही. हम इस मुद्दे पर फैसला नही कर रहे है. हम केवल राष्ट्रपति द्वारा दिए गए संदर्भ का उत्तर दे रहे हैं. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति या राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्थाओं के लिए समयसीमा तय करना राज्य के विभिन्न अंगों के बीच कार्यक्षमता में अंसतुलन पैदा कर सकता है.
केंद्र सरकार का रुख
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आगाह किया कि ऐसी समयसीमा तय करने से शक्तियों के संतुलन में बाधा आ सकती है और यह संवैधानिक अव्यवस्था को जन्म देगा. एसजी मेहता ने यह भी कहा कि एक अंग की विफलता या निष्क्रियता का यह मतलब नही की दूसरी अंग उन शक्तियों का इस्तेमाल करे जो संविधान ने उसे नहीं दी हैं. उन्होंने कहा कि यदि किसी भी अंग को दूसरे अंग की शक्तियां जनहित या संवैधानिक मूल्यों के नाम पर दी जाती हैं, तो यह संविधान निर्माताओं की कल्पना से परे एक संवैधानिक संकट होगा.
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