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सीजेआई सूर्यकांत ने सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर वर्गों को त्वरित न्याय मिले इसके लिए जारी किया दिशा निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कमजोर वर्गों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए याचिकाओं को चार श्रेणियों में बांटा है. कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75,000 से ज्यादा मामलों का निपटारा कर अमेरिका और ब्रिटेन को भी पीछे छोड़ दिया है.

Supreme Court, SOP
Edited by Radha Priya

देशभर की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है. हाल ही में कोर्ट ने एक SOP (Standard Operating Procedure) जारी किया है. सीजेआई सूर्यकांत ने सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर वर्गों को त्वरित न्याय मिले, इसके लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

कमजोर वर्गों को न्याय में प्राथमिकता

सीजेआई सूर्यकांत ने इसे चार हिस्सों में बांट दिया है. इसमें दिव्यांगजन और एसिड अटैक पीड़ितों द्वारा दायर याचिकाएं, 80 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों की ओर से दायर याचिकाएं, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों और विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से दायर याचिकाएं शामिल हैं. कोर्ट इन याचिकाओं पर प्राथमिकता के तौर पर सुनवाई करेगा, क्योंकि कोर्ट का मानना है कि बड़े मुकदमों के बीच इन याचिकाओं पर सुनवाई जल्द नहीं हो पाती है.

वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड निपटारा दर

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75,000 से ज्यादा याचिकाओं का निपटारा किया है, जो अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देशों के सुप्रीम कोर्ट से कहीं ज्यादा है. इनमें 51,357 दीवानी और 23,923 आपराधिक मामले शामिल थे. अदालत ने इनमें से 65,403 मामलों का निस्तारण कर दिया है, जिनमें 42,793 दीवानी और 22,610 आपराधिक मामलों के फैसले शामिल हैं. दिसंबर 2024 में 83,000 से ज्यादा केस लंबित थे, फिर भी अदालत ने रिकॉर्ड ‘डिस्पोजल रेट’ हासिल किया है.

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भारतीय न्यायपालिका की व्यापकता

अगर हम अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट से तुलना करें तो वहां हर साल हजारों याचिकाएं दाखिल होती हैं, लेकिन उनमें से केवल 70 से 80 मामलों को ही पूर्ण सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाता है; बाकी मामले प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिए जाते हैं. अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस संवैधानिक व्याख्या पर होता है, जबकि भारत का सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक मामलों के साथ-साथ अपीलों, विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP), जनहित याचिकाओं (PIL), आपराधिक और दीवानी मामलों को भी देखता है.

वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 1400 महत्वपूर्ण मामलों में फैसला दिया है. हालांकि, भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती जजों की कमी है. फिलहाल भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जो दुनिया के सबसे कम अनुपातों में से एक है.

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-भारत एक्सप्रेस



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