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झूठे मामलों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए पीड़ितों को अधिकार देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है.
मजिस्ट्रेट की शिकायत पर होगा मुकदमा
ये याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई है. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह नोटिस जारी किया है. दायर याचिका में कहा गया है कि अगर कोई झूठे एफआईआर दर्ज कराता है, तो उसके खिलाफ तभी मुकदमा दर्ज होगा जब मजिस्ट्रेट शिकायत करेगा.
इससे पहले दायर अन्य याचिका में कहा गया है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ झूठी शिकायतें, झूठे बयान, झूठी सूचना, झूठे सबूत और झूठे आरोप, जीवन की स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार तथा विधि के शासन के लिए गंभीर खतरा है.
झूठे FIR जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा
दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ झूठी शिकायतें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार के लिए खतरा है. याचिका में कहा गया है कि बीएनएस 2023 के अध्याय 14 में इन खतरों से निपटने के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं. लेकिन केंद्र और राज्यों ने इन्हें लागू करने के लिए उचित कदम नहीं उठाए हैं. दायर याचिका में केंद्र सरकार और सभी राज्यों को पक्षकार बनाया गया है.
क्या है याचिकाकर्ता की मांग?
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि थानों, तहसील कार्यालयों, जिला अदालतों, पंचायत भवनों और शैक्षणिक संस्थानों में सजा संबंधी प्रावधानों वाले बोर्ड लगाए जाएं. साथ ही, एफआईआर दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता को झूठी शिकायत के कानूनी परिणामों के बारे में अनिवार्य रूप से सूचित किया जाए और उससे एक शपथ पत्र लिया जाए कि दी गई जानकारी पूर्णतः सत्य है. झूठी शिकायत, जांच और गवाही को जघन्य अपराध घोषित करने और दोषी को 10 साल तक कि सजा की मांग की गई है. साथ ही दोषी की संपत्ति जब्त करने और नागरिकता रद्द करने की मांग की गई है.
क्या कहती है भारतीय न्याय संहिता?
याचिका में कहा गया है कि फर्जी मामलों से निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा और जीवन बर्बाद हो रहा है. दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता 2023 के चौदहवें अध्याय में झूठी शिकायतों और फर्जी साक्ष्यों से संबंधित अपराधों के लिए स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है.
याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि दर्ज मामलों और दोषसिद्धि दर के काफी अंतर है, जो झूठे मुकदमों और मनगढ़ंत साक्ष्यों की समस्या की ओर संकेत करता है. इससे आपराधिक न्यायप्रणाली पर बोझ पड़ रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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