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पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई से इनकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है. मार्च 2025 में सरकारी आवास पर कैश मिलने का मामला है.

Yashwant Verma

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर तत्काल (जल्द) सुनवाई से साफ इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के वकील मैथ्यूज जे. नेदुम्पारा ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले को मेंशन करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की थी.

वकील की दलील और कोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान वकील नेदुम्पारा ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री इस मामले को सूचीबद्ध (List) नहीं कर रही है. उन्होंने सीजेआई से आग्रह किया कि यदि अदालत चाहे तो याचिका को खारिज कर सकती है, लेकिन कम से कम इस मामले को एक नंबर देकर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाना चाहिए.

इस बीच, एक अन्य याचिकाकर्ता ने दावा किया कि लोकसभा की जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया साबित माना है. उनका तर्क था कि ऐसी स्थिति में एफआईआर दर्ज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं होनी चाहिए और समानता के सिद्धांत के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की शक्ति है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य वकील घनश्याम उपाध्याय द्वारा भी ऐसी ही याचिका दायर की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था. तब अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस तरह की याचिकाएं केवल सस्ती लोकप्रियता (Cheap Publicity) के लिए दाखिल की जाती हैं.

क्या है पूरा मामला?

14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद वहां बड़ी मात्रा में जली और आधी जली हुई नकदी (कैश) मिलने की खबरें सामने आई थीं. इस खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए तीन सदस्यीय कमेटी (जिसमें जस्टिस शील नागू शामिल थे) का गठन किया था. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विभागीय या ‘इन-हाउस’ जांच केवल एक अनुशासनात्मक प्रक्रिया हो सकती है, जो किसी भी आपराधिक जांच का विकल्प नहीं हो सकती.

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याचिका के अनुसार, 2 जून 2026 को सीबीआई, दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को औपचारिक शिकायत देकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA), भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य संबंधित कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी, लेकिन जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया.



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