सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार के गृह विभाग द्वारा कश्मीर पर लिखी गई 25 किताबों पर बैन लगाने से संबंधित मामले में दायर याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने को कहा है. जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या और जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली की पीठ ने जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को तीन जजों की बेंच के समक्ष लिस्ट करने को कहा है. इसके बाद संबंधित बेंच मामले में जल्द सुनवाई कर फैसला दे.
जम्मू कश्मीर सरकार ने कश्मीर पर लिखी गई 25 किताबों पर बैन लगा रखा है. इतना ही नही मार्केट से इन किताबों को जब्त करने का भी आदेश दिया है.
किताबें अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देती हैं- केंद्र
केंद्र सरकार का आरोप है कि इन किताबों से अलगाववाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. ये किताबे भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा है. यह साहित्य अक्सर इतिहास को विकृत कर प्रस्तुत करता है, जिसमें भारतीय सेना और सुरक्षा बलों को बदनाम करने, धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने और अलगाववादी मानसिकता को सामान्य बनाने के प्रयास साफ देखे जा सकते हैं. जिन किताबों को बैन किया गया है, इनमें एजी नूरानी की द कश्मीर डिस्प्यूट 1947-2002, अरुंधति राय की आजादी और अनुराधा भसीन जम्वाल की ए डिसमेंटल्ड स्टेट ( द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370), मोहम्मद यूसुफ सर्राफ की कश्मीर: फाइट फॉर फ्रीडम, क्रिस्टोफर स्नेडेन का इंडिपेंडेंट कश्मीर, सीमा काजी की बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन और सुमंत्र बोस की कश्मीर एट द क्रॉसरॉड्स शामिल है.
राज्य सरकार ने यह एक्शन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 98 के तहत लिया गया है. इसके अलावा आईपीसी की धारा 152, 196 और 197 भी लगाई गई हैं. आदेश में कहा गया है कि इसलिए भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 98 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, जम्मू कश्मीर सरकार 25 पुस्तकों के प्रकाशन और उनकी प्रतियों या अन्य दस्तवेज़ों को सरकार द्वारा जब्त करने की घोषणा करती है.
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