पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने नागरिकता और मतदाता सूची को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी व्यवस्था दी है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी व्यक्ति का नाम केवल वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) से हट जाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि उस व्यक्ति की भारत की नागरिकता समाप्त हो गई है.
नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं
माननीय मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष खंडपीठ ने कहा कि नागरिकता के संबंध में शीर्ष अदालत के पूर्व में दिए गए सभी फैसले पूरी तरह से स्पष्ट और अकाट्य हैं. अदालत ने कड़े शब्दों में रेखांकित किया कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का कानूनी निर्धारण (डिटरमिनेशन ऑफ सिटीजनशिप) करना भारत के केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता है. सर्वोच्च न्यायालय अब इस मुख्य याचिका पर आगामी 25 अगस्त 2026 को अगली विस्तृत सुनवाई करेगी.
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण की दलील
मामले की लाइव सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता प्रसेनजित बॉस की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने पश्चिम बंगाल की जमीनी स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने बेंच को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के तहत गठित किए गए कुल 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों (Appellate Tribunals) के समक्ष वर्तमान में करीब 34 लाख (3.4 मिलियन) अपीलें धूल फांक रही हैं और लंबित हैं. सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इतने लंबे समय में अब तक इनमें से केवल 38 हजार मामलों का ही अंतिम रूप से निपटारा हो पाया है.
उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कोर्ट को अवगत कराया कि जिन 38 हजार मामलों का निपटारा ट्रिब्यूनलों द्वारा किया गया है, उनमें से करीब 70 फीसदी अपीलें सही पाई गईं और उन्हें स्वीकार कर लिया गया है. जबकि बाकी बचे 30 फीसदी मामलों में याचिकाकर्ताओं को ट्रिब्यूनल से कोई राहत नहीं दी गई है, जिसके कारण अब कानूनी उपचार के लिए उन्हें लाचार होकर कोलकाता हाई कोर्ट (Kolkata High Court) के चक्कर काटने पड़ेंगे.
याचिकाकर्ता के वकील ने पुरजोर दलील दी कि जब तक इन अपीलों का फैसला नहीं हो जाता, तब तक जिन भी लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें स्थानीय प्रशासन द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS/राशन), अन्नपूर्णा योजना, और जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) जैसी आवश्यक बुनियादी सरकारी सुविधाओं और कल्याणकारी योजनाओं से पूरी तरह वंचित किया जा रहा है. उन्होंने आगाह किया कि राज्य में आगामी अक्टूबर महीने में प्रस्तावित नगर निकाय (लोकल बॉडी) चुनावों को देखते हुए यह गंभीर स्थिति और भी ज्यादा विस्फोटक हो सकती है.
जस्टिस बागची ने समझाया कानून का नियम
इस दलील पर हस्तक्षेप करते हुए पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ‘बिहार एसआईआर मामले’ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए एक नजीर (फैसले) को याद दिलाया. उन्होंने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह कानून तय कर चुका है कि यदि कोई अपीलीय ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति का नाम एसआईआर (SIR) सूची में शामिल करने से तकनीकी रूप से इनकार कर देता है, तो चुनाव आयोग को नागरिकता के अंतिम निर्धारण के लिए उस विशिष्ट मामले को भारत के नागरिकता अधिनियम (Citizenship Act) के तहत सीधे केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय (गृह मंत्रालय) को अग्रेषित करना होगा. उन्होंने दो टूक कहा:
“केंद्रीय चुनाव आयोग के पास भारतीय संविधान के तहत केवल और केवल देश की मतदाता सूची के उचित प्रबंधन, पुनरीक्षण और उसकी निगरानी करने की ही संवैधानिक जिम्मेदारी है; किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का न्यायिक या विधायी अधिकार उसके पास कतई नहीं है.”
पासपोर्ट प्रमाण मानने और डेटा सार्वजनिक करने की मांग
याचिकाकर्ता प्रसेनजित बॉस ने अपनी दायर याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से यह विशेष मांग भी की है कि ट्रिब्यूनलों में लंबित चल रहे सभी मामलों, विभिन्न जांच चरणों में आवेदकों द्वारा दाखिल किए गए फॉर्म 6 (Form 6) और फॉर्म 7 (Form 7) की कुल संख्या, उनके समयबद्ध निस्तारण और अस्वीकृति (रिजेक्शन) का पूरा प्रामाणिक ब्योरा इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से जारी किया जाए, ताकि इस पूरी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके.
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इसके साथ ही, याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह महत्वपूर्ण नीतिगत निर्देश देने की भी गुहार लगाई गई है कि यदि किसी भी नागरिक के पास भारत सरकार द्वारा जारी किया गया वैध और चालू पासपोर्ट (Valid Passport) मौजूद है, तो स्थानीय अधिकारियों द्वारा उसे उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता के सबसे मजबूत और अकाट्य डिजिटल प्रमाण के रूप में बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार किया जाना चाहिए.
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