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सबरीमाला विवाद: क्या आस्था मौलिक अधिकारों से ऊपर है? सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच करेगी 7 बड़े सवालों पर फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में नई संविधान पीठ के गठन की रूपरेखा तैयार कर ली है. अब केवल मंदिर प्रवेश ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री और दाउदी बोहरा समुदाय की प्रथाओं पर भी विचार होगा. कोर्ट ने सभी पक्षों से 14 मार्च तक लिखित दलीलें मांगी हैं.

Sabarimala Temple Case, Supreme Court
Edited by Radha Priya

Sabarimala Review Petition: सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री देने के फैसले के बाद दायर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 7 अप्रैल में सुनवाई करेगा. इसको लेकर 67 पुनर्विचार याचिका दायर की गई है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इसको लेकर रूप रेखा तय कर दिया है. कोर्ट नौ जजों की संविधान पीठ का गठन करेगा.

इन 7 सवालों के जवाब देगी संविधान पीठ

संविधान पीठ सात कानूनी सवालों पर विचार करेगा. जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है? क्या धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों की मान्यताओं की स्वतंत्रता परस्पर विरोधी है? क्या धार्मिक आस्था, मौलिक अधिकारों के अधीन हैं? धार्मिक स्वतंत्रता के व्यवहार में नैतिकता क्या है? धार्मिक मामलों में न्यायिक समीक्षा की क्या गुंजाइश है?

अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत “हिंदुओं के एक वर्ग” क्या कोई व्यक्ति जो धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, उस समूह की प्रथाओं को चुनौती देने वाली जनहित याचिका दायर कर सकता है. कोर्ट ने सभी पक्षों को 14 मार्च तक लिखित दलीलें दाखिल करने का आदेश दिया है.

सॉलिसिटर जनरल ने किया पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दायर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है. वहीं कोर्ट ने इस मामले में वरिष्ठ वकीप के परमेश्वर को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है. 2019 में बनी नौ जजों की बेंच अब खत्म हो चुकी है, क्योंकि सीजेआई सूर्यकांत को छोड़कर बाकी सभी सदस्य रिटायर हो चुके है.

नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नहीं है. इसमें मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश और दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना भी शामिल है. इसलिए इन मामलों पर पुनर्विचार होना चाहिए.

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मंदिर प्रबंधन की दलील और मासिक धर्म का विवाद

मामले की सुनवाई के दौरान सबरीमाला मंदिर प्रबंधन की ओर से पेश वकील ने बताया था कि 10 से 50 वर्ष आयु तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है, क्योंकि.मासिक धर्म के समय वे “शुद्धता” बनाए नहीं रख सकतीं. जिसके संविधान ने खारिज कर दिया था और सभी उम्र के महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दिया था.

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-भारत एक्सप्रेस



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