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‘द वॉइस ऑफ जस्टिस: गवई स्पीक्स’ पुस्तक का विमोचन; उपराष्ट्रपति ने वकीलों से की गरीबों के लिए साल में एक केस लड़ने की अपील

पूर्व सीजेआई बी. आर. गवई की पुस्तक ‘द वॉइस ऑफ जस्टिस: गवई स्पीक्स’ का विमोचन उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन और सीजेआई सूर्यकांत की उपस्थिति में किया गया. इस पुस्तक में उनके साढ़े सात साल के कार्यकाल के ऐतिहासिक भाषणों, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संतुलन पर विचारों का संकलन है.

CP Radhakrishnan
Edited by Vaibhav Gupta

पूर्व सीजेआई द्वारा लिखी गई किताब ‘ द वॉइस ऑफ जस्टिस गवई स्पीक्स पुस्तक का भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी राधाकृष्णन विमोचन किया. यह पुस्तक कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (CLEA) की पहल पर प्रकाशित की गई है और इसका संपादन प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार ने किया है. इस दौरान भारत के उपराष्ट्रपति मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए. जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता सीजेआई सूर्यकांत ने किया.

इनके अलावे जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना, दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय, पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना के अलावे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई रिटायर्ड जज, वरिष्ठ वकील और न्यायिक अधिकारी शामिल हुए. उप राष्ट्रपति सी. पी राधाकृष्णन ने कार्यक्रम में मौजूद वकीलों से आग्रह किया कि कम से साल में एक केस गरीबो के लिए लड़े.

‘न्याय की आवाज भावनाहीन न हो’: CJI

सीजेआई सूर्यकांत ने इस पुस्तक के लिए जस्टिस गवई को बधाई दी. उन्होंने कहा कि जस्टिस गवई को उनके विचारों के संग्रह के लिए बधाई देता हूं. जो अब उन अदालतों से कही दूर पाठकों तक पहुंचेगा, जहां ये विचार पहली बार व्यक्त किए गए थे.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यह किताब पढ़ना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह हमें बताती है कि न्याय की आवाज में तर्क तो होना चाहिए, लेकिन वह कभी भी भावनाहीन नहीं होनी चाहिए. वह मजबूत तो होनी चाहिए, लेकिन कभी भी अहंकारी नहीं और उसे मानवीय रहते हुए संवैधानिक भी होना चाहिए. जस्टिस गवई की आवाज ने हमें उस जरूरी संतुलन की याद दिलाई है.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आज हम न सिर्फ एक साहित्यिक उपलब्धि पेश कर रहे हैं. बल्कि एक नैतिक दिशा सूचक भी, जो वकीलों, विद्वानों और नागरिकों, सभी मार्गदर्शन करेगा. सीजेआई ने कहा कि और इसलिए मुझे उम्मीद है कि यह किताब अलग-अलग अदालतों की लाइब्रेरी, लॉ स्कूलों, जजों के चैंबर और सबसे जरूरी बात, उन युवा वकीलों के दिमाग तक पहुंचेगी जो हमारी संवैधानिक यात्रा के अगले अध्याय को आकार देंगे.

सही समय पर आई किताब

पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि एक जज को आमतौर पर उनके फैसलों से याद किया जाता है. भाषण अक्सर किसी खास मौके पर खास लोगों के सामने दिए जाते है और शायद ही कोई सोचता है कि एक दिन उन्हें एक किताब में इकठ्ठा किया जाएगा. जस्टिस गवई ने कहा कि जो मैंने पिछले साढ़े सात वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के जज और भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर भारत और विदेश, दोनों जगहों पर दिए हैं.

पूर्व सीजेआई गवई ने यह भी कहा कि मुझे उम्मीद है कि यह किताब न सिर्फ भाषणों का संग्रह होगा, बल्कि उन विचारों का रिकॉर्ड भी होगी जिन्होंने मेरे पूरे न्यायिक कैरियर के दौरान मुझे प्रेरित किया है. जबकि जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि यह किताब सही समय पर आई है और इसका लंबे समय से इंतजार था, क्योंकि इसमें उस व्यक्ति के विचार और सोच शामिल है, जिन्हें मैं न केवल बेंच पर एक साथी के तौर पर, बल्कि एक प्यारे दोस्त के तौर पर भी जानने का सौभाग्य पा चुका हूं.

संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय का संरक्षण

पूर्व सीजेआई गवई ने कहा कि मैं जस्टिस गवई को सात साल से अधिक समय से जानता हूं. हम कई मुद्दों पर सहमत रहे है और कुछ पर असहमत भी. लेकिन वे बातचीत हमेशा ज्ञानवर्धक रही है.क्योंकि हममें से हर कोई एक दूसरे से कुछ न कुछ सीखकर ही आगे बढ़ा है.

जस्टिस गवई में मुझे एक ऐसा दोस्त मिला है, जिसने हमेशा धैर्य से मेरी बात सुनी, सोच समझकर सलाह दी और अच्छे और बुरे दोनों समय मे हमेशा मेरा साथ दिया. पुस्तक में जस्टिस बी. आर. गवई के न्यायिक कार्यकाल के दौरान दिए गए महत्वपूर्ण भाषणों और संबोधनों को शामिल किया गया है. इसका उद्देश्य संविधान, कानून के शासन, सामाजिक न्याय और न्याय तक समान पहुंच जैसे विषयों पर उनके विचारों को संरक्षित करना और व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराना है.

क्या है पुस्तक में खास और किसके लिए उपयोगी?

यह पुस्तक भारतीय न्यायपालिका, संविधान तथा न्याय व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर उनके दृष्टिकोण को सामने लाती है. पुस्तक में परिवर्तनकारी संवैधानिकता बदलते भारत मे न्यायपालिका की भूमिका, मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व, वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सहयोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है.

इसमें यह भी बताया गया है कि पूर्व सीजेआई गवई किस तरह मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने की वकालत करते हैं, ताकि संविधान के सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के उद्देश्य को प्रभावी बनाया जा सके. यह संकलन कानून, न्याय वितरण, सामाजिक समावेशन और 21 वी सदी में न्याय में न्यायपालिका की बदलती भूमिका पर पूर्व सीजेआई गवई के विचारों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है.

पुस्तक विधि के छात्रों, शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और संवैधानिक लोकतंत्र में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री मानी जा रही है. इस पुस्तक का प्रकाशन Thomson Reuters ने किया है. पुस्तक की प्रस्तावना सीजेआई सूर्यकांत ने लिखी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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