प्रतीकात्मक फोटो
Chhath Puja 2025: छठ पूजा बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाई जाती है, सिर्फ सूर्य देव और छठी मैया की उपासना नहीं, बल्कि महाभारत के सबसे महान पात्रों में से एक, सूर्यपुत्र अंगराज कर्ण के अद्भुत और रहस्यमय जीवन से जुड़ी है. चार दिनों तक चलने वाले इस पवित्र पर्व की नींव में कर्ण की वह असाधारण कहानी छिपी है, जिसमें उनके पूर्वजन्म का राज खुलता है. कर्ण की यह कहानी बिहार के भागलपुर से खास संबंध रखती है. आइये जानें क्या है यह कहानी?
कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे, जिन्हें माता कुंती ने सूर्य मंत्र के जाप से जन्म दिया था. सामाजिक दबाव के कारण कुंती ने कर्ण को नदी में बहा दिया. नदी में बहता यह बच्चा राधा-अधिरथ दंपति को मिला, जिन्होंने उसे पाला. बालक कर्ण में सूर्य देव का आशीर्वाद और दिव्यता स्पष्ट रूप से झलकती थी. उनका पूर्वजन्म भी सूर्य देव के प्रति समर्पित था.
क्या छठी मैया से जुड़े कर्ण की कहानी? (Chhath Puja Untold Story)
कहा जाता है कि पूर्वजन्म में कर्ण दंभोद्भवा नामक असुर थे, जिसे सूर्य देव ने 1000 कवच और दिव्य कुंडल दिए थे, जो उसे असाधारण सुरक्षा प्रदान करते थे. वरदान के कारण वह असुर अपने को अजेय-अमर समझकर अत्याचारी हो गया था. नर और नारायण ने बारी-बारी से तपस्या करके दंभोद्भवा के 999 कवच तोड़ दिए और जब एक कवच बच गया तो असुर सूर्य लोक में जाकर छुप गया. सूर्य देव ने उनकी भक्ति देखकर अगले जन्म में उन्हें अपना पुत्र बनने का वरदान दिया.
जब कर्ण बड़े हुए, तब उनकी मित्रता दुर्योधन से हुई. दुर्योधन ने उन्हें अंग देश का राजा बनाया. अंग देश का क्षेत्र वर्तमान बिहार के भागलपुर और मुंगेर के आसपास था. यही वह जगह थी, जहां कर्ण ने पहली बार छठ पूजा होते देखी. यह पूजा सूर्य देव और छठी मैया को अर्घ्य देने की थी. कर्ण सूर्यपुत्र थे, इसलिए उन्होंने रोज सुबह सूर्य नमस्कार और सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया. छठ पूजा का महत्व समझकर उन्होंने इसे नियमित रूप से करना शुरू किया. वह न केवल सूर्य देव की पूजा करते थे, बल्कि छठी मैया की स्तुति भी करते थे.
चार दिन चलता है Chhath Puja का पर्व
चार दिनों तक चलने वाले इस छठ पूजा में व्रती निर्जल उपवास रखते हैं. कहते हैं कि इस पूजा से व्यक्ति के पाप दूर होते हैं, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं. बता दें महाभारत में कर्ण को महान योद्धाओं में से एक माना गया है, जिनकी बहादुरी, दानवीरता और धर्म के प्रति आस्था आज भी लोगों के लिए प्रेरणा है. इस प्रकार महाभारत काल में अंगराज कर्ण के माध्यम से छठ पूजा की परंपरा को बिहार और पूर्वांचल में स्थायी रूप मिला.
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बिहार का अटूट हिस्सा
छठ पूजा की यह कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भक्ति, वरदान और पुनर्जन्म के एक जटिल चक्र को दर्शाती है. सूर्यपुत्र कर्ण ने अंग देश (वर्तमान भागलपुर) में सूर्य नमस्कार और छठी मैया की स्तुति को नियमित करके इस पावन परंपरा को स्थायी रूप दिया. यह कथा हमें सिखाती है कि दिव्यता और भक्ति के सामने जन्म और कर्म की सीमाएं टूट जाती हैं. इस प्रकार, चार दिनों का यह व्रत, जो निर्जल उपवास और सूर्य को अर्घ्य देने के लिए प्रसिद्ध है, कर्ण के त्याग और सूर्य के प्रति उनकी अटूट आस्था के कारण आज भी बिहार और पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत का एक अटूट हिस्सा बना हुआ है.
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