Shri Krishna Departure To Paramdham
परमेश्वर श्रीहरि के पूर्ण-अवतार माने गए योगेश्वर श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व संपूर्ण विश्व में अपार श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. द्वापर युग के अंत में धर्म की स्थापना, कंस और जरासंध जैसे आततायियों का संहार और महाभारत के युद्ध में मानवता को ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का ज्ञान देने के बाद, श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेटकर परमधाम (वैकुंठ) की ओर प्रस्थान किया था.
परंतु, क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने का सटीक समय क्या था? उनके जाते ही पृथ्वी पर क्या-क्या परिवर्तन हुए और क्या कलयुग का आगमन ठीक उसी क्षण हुआ था? आइए, विभिन्न पुराणों, वैदिक कालगणना और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर श्लोकों सहित इस परम सत्य को गहराई से समझते हैं.
1. द्वापर युग में श्रीकृष्ण का अवतार धारण करना
सनातन परंपरा में जब-जब अधर्म का प्रभाव बढ़ता है, तब-तब परमेश्वर स्वयं साकार रूप धारण करके अवतरित होते हैं. श्रीमद्भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध में स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण को केवल एक अवतार नहीं, बल्कि स्वयं ‘भगवान’ कहा गया है:
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ।।
(श्रीमद्भागवत पुराण – 1.3.28)
भावार्थ: अन्य सभी अवतार भगवान के अंश या कला अवतार हैं, परंतु श्रीकृष्ण स्वयं साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं. वे हर युग में दैत्यों और पापियों से व्याकुल हुई पृथ्वी का कल्याण करने के लिए प्रकट होते हैं.

द्वापर युग के संधिकाल में अधर्म और पाप का बोझ इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी (गो-रूप धारण करके) ब्रह्मा जी और देवताओं के साथ विष्णु जी की शरण में पहुँची. तब भगवान विष्णु ने द्वापर में यदुवंश के कुल में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में प्राकट्य का वरदान दिया.
2. पृथ्वी पर श्रीकृष्ण का वास: 125 वर्ष, 8 माह
अक्सर श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न रहता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी मानव लीला के दौरान पृथ्वी पर कितना समय व्यतीत किया? श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव जी से संवाद करते हुए अपनी अवधि का उल्लेख करते हैं:
यदा मुकुन्दो भगवान् महीं त्यक्त्वा दिवं गतः ।
तदा दिनात् कलिः प्राप्तः सर्वधर्मविनाशनः ।।
(विष्णु पुराण – 4.24.35)
और विष्णु पुराण एवं श्रीमद्भागवत (11.6.25) के स्पष्ट संदर्भों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की भूलोक लीला अवधि सौर गणना (मानव वर्षों) में 125 वर्ष से अधिक रही:
सार्धमेकशते वर्षे श्रीमद्भागवतं शृणु ।
तत्रावतारः कृष्णस्य पञ्चविंशदुत्तरम् ।।
अर्थात् श्रीकृष्ण पृथ्वी पर 125 वर्ष और 8 माह (लगभग 125.7 वर्ष) तक भौतिक रूप में विद्यमान रहे. इस दौरान उन्होंने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को जन्म लेकर अपने जीवन के शुरुआती वर्ष गोकुल-वृंदावन में, तत्पश्चात मथुरा और अंत में द्वारकाधीश के रूप में बिताए.
3. श्रीकृष्ण के जाने से धरती पर क्या-क्या बदला?
श्रीकृष्ण का इस धरा पर होना संपूर्ण सृष्टि के लिए एक सुरक्षा कवच की भांति था. जैसे ही उन्होंने प्रभास क्षेत्र (गुजरात के सोमनाथ के पास) में भालका तीर्थ पर अपनी मानव लीला को विराम दिया और परमधाम लौटे, पृथ्वी का स्वरूप और प्रकृति रातों-रात बदल गई:
समुद्र में समा गई थी उनकी द्वारकापुरी:

भगवान के स्वधाम गमन के सात दिनों के भीतर ही महासमुद्र ने पूरी भव्य और स्वर्णमयी द्वारका नगरी को अपने अंदर निगल लिया. केवल भगवान का निज महल (मंदिर) शेष बचा.
प्रकृति का उदास होना:
वृक्षों से फल-फूल झड़ने लगे, नदियों का जल सूखने लगा और दिशाएँ कांतिहीन (धुंधली) हो गईं. पशु-पक्षी और जनमानस एक अज्ञात भय और शोक से भर गए.
धर्म को लोप और पांडवों का महाप्रस्थान:
श्रीकृष्ण के जाते ही धर्म के महान संरक्षक महाराज युधिष्ठिर को यह अहसास हो गया कि अब पृथ्वी पर रहना उचित नहीं है. पांडवों ने तुरंत अपना राज-पाट अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को सौंप दिया और हिमालय की ओर महाप्रस्थान (स्वर्गारोहण यात्रा) कर गए.
4. क्या कलयुग उसी समय शुरू हो गया था? (पौराणिक/गणितीय विश्लेषण)
इस विषय पर पुराणों में बहुत सुंदर और स्पष्ट विवरण मिलता है. कलयुग का प्रभाव श्रीकृष्ण के रहते हुए ही द्वारका के बाहर शुरू हो गया था, लेकिन कलयुग पूरी तरह से स्वतंत्र श्रीकृष्ण के परमधाम जाने के सटीक क्षण से हुआ.
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वादश स्कन्ध में स्पष्ट प्रमाण अंकित है:
यदा मुकुन्दो भगवान् महीं त्यक्त्वा दिवं गतः ।
तदैव कलिरायातः सर्वधर्मविनाशनः ।।

(श्रीमद्भागवत पुराण – 12.2.33)
भावार्थ: जिस क्षण (जिस दिन) भगवान मुकुंद (श्रीकृष्ण) इस पृथ्वी को छोड़कर अपने परमधाम पधारे, ठीक उसी क्षण से सर्व-धर्म का विनाश करने वाला कलयुग पृथ्वी पर पूर्ण रूप से प्रविष्ट हो गया.
सौर कालगणना और ऐतिहासिक तिथि
पौराणिक एवं ज्योतिषीय कालगणना (सूर्य सिद्धांत):
भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम गमन की तिथि ईसा पूर्व (BC) 3102 ईसा पूर्व (18 फरवरी, 3102 ई.पू.) मानी जाती है. इसी तिथि को कलयुग का प्रथम दिन (प्रारंभ) स्वीकार किया गया है.
वर्तमान समय (वर्ष 2026 तक की गणना):
यदि हम 3102 ईसा पूर्व में वर्तमान वर्ष (2026) को जोड़ते हैं, तो कलयुग के प्रारंभ को 5127 वर्ष (3102 + 2026 – 1) बीत चुके हैं.
वैदिक-इतिहासकारों की मान्यताएं
पुरातत्वविदों, खगोलविदों (जैसे आर्यभट्ट का ‘आर्यभटीय’) और महाभारत के नक्षत्रों की गणना के अनुसार, श्रीकृष्ण का भूलोक त्याग आज से लगभग 5,127 वर्ष पूर्व हुआ था. श्रीकृष्ण के जाने के बाद से ही कलयुग का चक्र निर्बाध रूप से चल रहा है. आज यदि हम उनके जन्मोत्सव का पावन पर्व मना रहे हैं, तो इसका मूल संदेश यही है कि भले ही भगवान श्रीकृष्ण भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, परंतु श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान और उनके नाम-संकीर्तन के रूप में वे आज भी कण-कण में जीवंत हैं. कलयुग में उनके बताए निष्काम कर्म और भक्ति के मार्ग पर चलना ही धर्म का सच्चा स्वरूप है.
-भारत एक्सप्रेस
5253वाँ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: आज ही के दिन द्वापर युग में परमेश्वर ने लिया था मानव अवतार, पृथ्वी पर 125 वर्ष बिताए
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