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5253वाँ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: आज ही के दिन परमेश्वर ने पृथ्वी पर लिया था मानव अवतार, 125 वर्ष बिताए; जिस दिन प्रस्थान किया तभी से शुरू हो गया कलयुग

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है. हिंदू पंचांग और वैदिक गणना के अनुसार, इस साल यह पावन त्योहार 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जा रहा है. आइए समझिए, उनके अवतार का परम उद्देश्य: क्यों धरा पर पधारे स्वयं परमेश्वर?

आज भगवान श्रीकृष्ण का 5253वाँ जन्मोत्सव (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) पूरी दुनिया में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में, उत्तर प्रदेश में मथुरा की पावन भूमि पर अवतरित हुए परमेश्वर श्रीकृष्ण का मध्यरात्रि में विशेष महाअभिषेक और जन्मोत्सव आयोजित हो रहा है.

अवतार का उद्देश्य: क्यों धरा पर पधारे स्वयं परमेश्वर?

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने अवतार लेने के गूढ़ कारणों को स्पष्ट किया है:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ४.७-८)

अर्थात: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं की रचना करता हूँ. सज्जनों के उद्धार, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ.

श्रीकृष्ण केवल एक दुष्ट राक्षसराज कंस का वध करने नहीं आए थे; वे पृथ्वी (भूमि देवी) के उस अतिशय भार को हरने आए थे, जो निरंकुश और आक्रान्ता राजाओं के कारण अधर्म से बोझिल हो चुकी थी.

प्राकट्य का समय: जब उल्लास से भर गई पृथ्वी

जब महाक्रूर राक्षसराज कंस के कारागार में आधी रात को परब्रह्म का प्राकट्य हुआ, तब संपूर्ण सृष्टि अलौकिक सौंदर्य से भर गई थी.

विकसत्पद्मकुमुदद्रह्रदराकापतिप्रभम्।

निशीथे तमौभूते जायमाने जनार्दने॥

(श्रीमद्भागवतम् १०.३.१-५ का भाव सार)

चारों ओर शांति छा गई. नदियाँ स्वच्छ जल से बहने लगीं, वनों में फूल खिल उठे, दिशाएँ प्रसन्न हो गईं और शीतल, मंद, सुगंधित पवन चलने लगी. मेघों ने मंद-मंद गर्जना कर पुष्पवर्षा की और देव-दुंदुभियाँ बजने लगीं. उस घने अंधकारमयी कारागार में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए चतुर्भुज रूप में जगदीश्वर का प्राकट्य हुआ.

वसुदेव और देवकी के घर ही क्यों हुआ प्राकट्य?

श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध और गर्ग संहिता के अनुसार, पूर्वजन्म में वसुदेव जी ‘सूतपा’ नामक प्रजापति थे और देवकी जी ‘पृश्नि’ थीं। दोनों ने सहस्रों वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की थी. जब भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए, तो उन्होंने तीन बार वरदान में भगवान जैसा पुत्र ही माँगा.

भगवान ने कहा, “मेरे समान दूसरा कोई नहीं है, इसलिए मैं स्वयं ही आपका पुत्र बनूँगा.” अपने इसी वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए प्रभु प्रथम जन्म में ‘पृश्निगर्भ’, द्वितीय जन्म (त्रेता युग) में राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र ‘राम’, तथा द्वापर युग में वसुदेव और देवकी के आठवें पुत्र ‘श्रीकृष्ण’ के रूप में अवतरित हुए.

कंस ने 6 संतानों की हत्‍या कर दी थी, 8वें प्रभु हुए

कंस को आकाशवाणी द्वारा ज्ञात हुआ था कि देवकी की आठवीं संतान उसका काल बनेगी. भयभीत कंस ने वसुदेव और देवकी को मथुरा के कारागार में बंदी बना लिया और एक-एक करके उनकी प्रारंभिक 6 संतानों (कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, सम्मर्दन और भद्र) का निष्ठुरता से वध कर दिया.

सातवें गर्भ के रूप में स्वयं शेषनाग पधारे, जिन्हें योगमाया ने सैटलाइट की भाँति संकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया, जिन्हें हम ‘बलराम’ के नाम से जानते हैं. इसके पश्चात 8वीं संतान के रूप में स्वयं भगवान ने जन्म लिया. जिन्‍हें श्रीकृष्ण कहा गया.

धरती को अधर्म और असुरों के अत्याचार से मुक्त करने के लिए श्रीकृष्ण और बलराम ने अपनी बाल और किशोरावस्था से ही दुष्टों का अंत शुरू कर दिया था.

कंस का वध कर पृथ्वी का बोझ यूं हल्का किया

महाक्रूर राक्षसराज कंस वसुदेव और देवकी की 6 संतानों की हत्या कर चुका था. हालांकि, उसे बलराम और श्रीकृष्ण का पता नहीं चल पाया. कई साल उसने उन्हें ढूंढने की कोशिश की. वह अपने अनुचरों को कहता था कि जहां भी वसुदेव-देवकी का पुत्र (श्रीकृष्ण) दिखे, उसे पकड़कर मेरे पास ले आना, मैं स्वयं उसकी हत्या करूंगा. हालांकि, जिन-जिनको कंस ने भेजा था, वे सब पापी बलराम और श्रीकृष्ण के हाथों मारे गए.

जब श्रीकृष्ण लगभग 12 वर्ष के हुए, तो मथुरा की रंगभूमि में प्रवेश कर उन्होंने कंस को सबके सामने मौत के घाट उतार दिया. श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध), विष्णु पुराण (पंचम अंश) और हरिवंश पुराण के अनुसार मथुरा की रंगभूमि में कंस वध का संपूर्ण प्रसंग अत्यंत रोमांचक है. गर्ग संहिता की काल-गणना के अनुसार, जब श्रीकृष्ण ने मथुरा की रंगभूमि में प्रवेश कर कंस का वध किया था, तब उनकी आयु 11 वर्ष 7 माह (लगभग 12 वर्ष) थी. इतनी अल्प आयु में ही उन्होंने कंस द्वारा भेजे गए विशाल हाथी और मल्ल योद्धाओं का संहार कर अत्याचार का अंत किया था.

खुद कंस ने श्रीकृष्ण को अपनी रंगभूमि में मथुरा बुलवाया था


दरअसल, कंस ने श्रीकृष्ण की हत्या करने के उद्देश्य से मथुरा में ‘धनुष-यज्ञ’ (चांपीय-यज्ञ) और मल्लयुद्ध का आयोजन किया था. अक्रूरजी दोनों भाइयों- श्रीकृष्ण और बलराम को वृंदावन से कंस की राजधानी मथुरा लेकर गए. जहां रंगभूमि के प्रवेश द्वार पर ही कंस ने खूंखार हाथी (नाम- कुवलयापीड) को श्रीकृष्ण को कुचलने के लिए छोड़ रखा था. श्रीकृष्ण ने पहले उस हाथी को मारा, फिर उसके दाँत उखाड़कर आगे बढ़े. रंगभूमि में पहुँचते ही कंस के पहलवान चाणूर और मुष्टिक ने उन्हें मल्लयुद्ध के लिए ललकारा.

भगवान श्रीकृष्ण ने चाणूर को उसके हाथ पकड़कर हवा में घुमाया और पृथ्वी पर दे पटका, जिससे उसके प्राण निकल गए. बलराम जी ने मुष्टिक पहलवान का संहार किया. ये देखकर कंस अत्यंत क्रोधित हो गया. उसने अपनी सेना को आदेश दिया- “इन वसुदेव के बालकों को तुरंत बंदी बना लो, नन्द को बाँध लो और वसुदेव-उग्रसेन की हत्या कर दो!”

कंस को ऐसा कहते देख श्रीकृष्ण एक ही छलांग में उसके ऊँचे सिंहासन पर जा चढ़े.

तमापतन्तं चित्तज्ञः प्रगृह्य केशेषु सम्भ्रमत्।

किरीटमुत्सार्य रुषा पातयामास तत्तलात्॥

तस्योपरि स्वयम्पत्य विश्वात्मा विश्वसंश्रयः।

(श्रीमद्भागवतम् १०.४४.३६-३७)

श्रीकृष्ण ने कंस का मुकुट गिरते ही उसके केशों (बालों) को पकड़ लिया और उसे खींचते हुए मंच से नीचे रंगभूमि के अखाड़े में पटक दिया. इसके बाद संपूर्ण ब्रह्मांड के भार-स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कंस के वक्षस्थल (छाती) पर कूद पड़े. कंस के मुँह से रक्त निकलने लगा और उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए.

इसके बाद श्रीकृष्ण ने कंस को केशाग्र से पकड़कर रंगभूमि में घसीटा ताकि सबको विश्वास हो सके कि अत्याचारी राजा का अंत हो चुका है.

कंस के साथ कौन कौन मारे गए थे?

मथुरा की रंगभूमि में केवल कंस ही नहीं, बल्कि उसके प्रमुख योद्धा और भाई भी मारे गए थे. रंगभूमि में कंस, उसके 8 छोटे भाई, उसके मुख्य पहलवान और उसका मदमस्त हाथी कुवलयापीड- ये सभी मारे गए. कंस का अंत करने के बाद श्रीकृष्ण ने उसके पिता उग्रसेन को कारागार से मुक्त कराकर पुनः मथुरा का राजा बनाया.

  • कुवलयापीड (कंस का खूँखार हाथी)
  • अष्टक (कुवलयापीड का महावत)
  • कंस के मुख्य पहलवान: चाणूर और मुष्टिक, कूट, शल, तोशलक
  • कंक (कंस का छोटा भाई)

15 महाक्रूर राक्षस: जिन्‍हें श्रीकृष्ण-बलराम ने मारा

क्रूर असुर / राक्षस प्राकट्य / रूप किसके हाथों मरे
१. पूतना विषधारी राक्षसी (गोपिका बनकर दूध पिलाने आई) भगवान श्रीकृष्ण
२. तृणावर्त चक्रवात/बवंडर रूपी दैत्य भगवान श्रीकृष्ण
३. वत्सासुर बछड़े के रूप में आया असुर भगवान श्रीकृष्ण
४. बकासुर विशाल बगुले का रूप धारक राक्षस भगवान श्रीकृष्ण
५. अघासुर विशाल अजगर (कंस का सेनापति) भगवान श्रीकृष्ण
६. धेनुकासुर गधे के रूप में रहने वाला दैत्य (तालवन) भगवान बलराम
७. प्रलंबासुर गोप बालक का छद्म रूप धरने वाला भगवान बलराम
८. अरिष्टासुर हिंसक बैल (वृषभ) रूपी दानव भगवान श्रीकृष्ण
९. केशी भयंकर घोड़े का रूप धारक असुर भगवान श्रीकृष्ण
१०. व्योमासुर गुफाओं में छिपाने वाला मायावी दैत्य भगवान श्रीकृष्ण
११. कुवलयापीड कंस का मत्त और खूँखार हाथी भगवान श्रीकृष्ण
१२. चाणूर कंस का प्रधान मल्ल (पहलवान) भगवान श्रीकृष्ण
१३. मुष्टिक कंस का खूँखार मल्ल योद्धा भगवान बलराम
१४. कंस अधर्मी अत्याचारी मथुरा का राजा भगवान श्रीकृष्ण
१५. नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुर का परम अत्याचारी दैत्य भगवान श्रीकृष्ण

इनके अतिरिक्त कालयवन, जरासंध (भीम के जरिए) और शिशुपाल जैसे महापापियों का संहार करके प्रभु ने पृथ्वी का भार हरण करके मानव जाति का पालन-पोषण किया.

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तस्वीर: परमेश्वर अपने मूल विष्णु रूप में।

125 वर्ष 8 माह मानव रूप में पृथ्वी पर रहे भगवान

वैदिक पंचांग और भागवत पुराण की गणना के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर 125 वर्ष 8 माह और 7 दिन तक मानव रूप में अपनी अलौकिक लीलाएँ रचीं. अंततः सशरीर परमधाम लौटे.

यदैव भगवान्विष्णुर्दिवं यातस्तदैधत।

कलिरधर्मप्रभवो येनाधर्मो धृतो भवेत्॥

(विष्णु पुराण ४.२४.३५)

अर्थात: जिस क्षण परमेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी भौतिक देह त्याग कर अपने परम धाम (वैकुंठ/गोलोक) का रुख किया, ठीक उसी क्षण से पृथ्वी पर अधर्म का मूल ‘कलयुग’ प्रारंभ हो गया.

आज 5253वें जन्मोत्सव पर भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश, उनकी नीतियाँ और गीता का अमृत ज्ञान मानव सभ्यता के लिए सही मार्ग दिखाने वाला एकमात्र प्रासंगिक पथ-प्रदर्शक है.

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