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गाजियाबाद में बांटी ‘तलवार’ तो संभल में ‘कलम-फूल’; नफरत के जवाब में AIMIM का ये अंदाज जीत रहा है लोगों का दिल

संभल में AIMIM कार्यकर्ताओं ने गाजियाबाद में तलवारे बांटने की घटना के विरोध में अनोखा और शांतिपूर्ण तरीका अपनाया है.

रिपोर्ट- अंसार मलिक


आजकल देश में जहां देखो वहां सियासत गरमाई हुई है. कहीं बयानों के तीर चल रहे हैं, तो कहीं प्रतीकों के जरिए अपनी ताकत दिखाने की कोशिश हो रही है. हाल ही में गाजियाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान तलवारें बांटने का मामला सामने आया, जिसने सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक खूब सुर्खियां बटोरीं. लेकिन इस घटना के विरोध में संभल से जो तस्वीर निकलकर आई है, वह वाकई सुकून देने वाली है.

संभल में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के कार्यकर्ताओं ने तलवारों के जवाब में ना तो नारेबाजी की और ना ही हंगामा किया. इसके बजाय उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो सीधा दिल तक पहुंचता है. कार्यकर्ताओं ने शहर के व्यस्त चौधरी सराय चौराहे पर खड़े होकर राहगीरों को कलम और गुलाब के फूल भेंट किए.

क्यों बांटी गई संभल के चौराहे पर कलमें?

इस अनोखे विरोध प्रदर्शन की कमान संभाल रहे AIMIM के जिला अध्यक्ष असद अब्दुल्ला ने दो-टूक शब्दों में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि समाज को आज हिंसा के रास्ते पर धकेलने की कोशिश हो रही है, जबकि असली जरूरत नफरत को खत्म करने की है. असद का कहना था, “हम यह पैगाम देना चाहते हैं कि ज्ञान और आपसी भाईचारा ही वह जरिया है जिससे देश तरक्की कर सकता है. हथियार उठाना किसी समस्या का समाधान नहीं है.”

इस मौके पर चेयरमैन प्रतिनिधि चौधरी मुशीर खां भी मौजूद रहे. उन्होंने बड़ी गहरी बात कही कि कोई भी मुल्क तलवार के दम पर नहीं, बल्कि मोहब्बत और कलम की ताकत से आगे बढ़ता है. उन्होंने जोर दिया कि हमें अपनी अगली पीढ़ी को नफरत की आग में झोंकने के बजाय उनके हाथों में किताबें और इंसानियत का सबक देना चाहिए.

दोहरे मापदंड पर भी उठाया सवाल

फूल और कलम बांटते हुए कार्यकर्ताओं के मन में एक टीस भी दिखी. असद अब्दुल्ला ने प्रशासन और सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज देश में कानून सबके लिए एक जैसा नजर नहीं आता. उन्होंने आरोप लगाया कि अगर यही काम—यानी हथियार बांटना—किसी दलित या मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति ने किया होता, तो अब तक शायद ‘बुलडोजर’ वाली कार्रवाई हो चुकी होती. उन्होंने प्रशासन से मांग की कि नियम और कायदे हर नागरिक के लिए बराबर होने चाहिए, चाहे वह किसी भी मजहब या गुट से हो.

आम जनता ने भी थपथपाई पीठ

चौराहे से गुजर रहे लोग पहले तो थोड़ा हैरान हुए, लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये फूल और कलम शांति का संदेश देने के लिए बांटे जा रहे हैं, तो उन्होंने भी इसकी खूब सराहना की. स्थानीय लोगों का कहना है कि आज के दौर में जब हर छोटी बात पर विवाद खड़ा हो जाता है, ऐसे में प्यार और भाईचारे की बात करना वाकई काबिले-तारीफ है.

पूरा कार्यक्रम बेहद शांतिपूर्ण रहा. ना कोई ट्रैफिक जाम हुआ और ना ही कोई शोर-शराबा. कुल मिलाकर, संभल से आई इस ‘कलम और गुलाब’ की खुशबू ने यह तो साबित कर दिया कि विरोध दर्ज कराने के लिए हमेशा सड़कों पर उतरना या चिल्लाना जरूरी नहीं होता, कभी-कभी एक छोटा सा फूल भी बड़ी से बड़ी तलवार पर भारी पड़ जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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