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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दहेज हत्या केस में पति की जमानत रद्द, जज पर जांच की सिफारिश

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या मामले में पति को दी गई जमानत रद्द कर दी और जमानत देने वाले अपर सत्र न्यायाधीश के खिलाफ जांच की सिफारिश की.

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा NSA रद्द करने के फैसले को UP सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के मामले में पर्याप्त साक्ष्यों और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत लागू वैधानिक अनुमान की अनदेखी कर पति को जमानत देने वाले अपर सत्र न्यायाधीश के खिलाफ जांच की सिफारिश की है. हाईकोर्ट ने पति को दी गई जमानत भी रद्द कर दिया है. न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की कोर्ट ने जालौन के उरई की अदालत द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत के खिलाफ दाखिल जमानत रद्द करने की अर्जी पर यह आदेश दिया.
बताया गया कि मृतका की शादी के सात वर्ष के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई. मेडिकल जांच में मृत्यु से पहले फांसी और दम घुटने के संकेत मिले थे. यह भी आरोप था कि मौत से ठीक पहले मृतका को दहेज की मांग पूरी न होने के कारण प्रताड़ित किया गया था.

कोर्ट ने पूछा कि उन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत लागू अनुमान की अनदेखी करते हुए बिना पर्याप्त कारण बताए पति को जमानत कैसे दे दी. अपने स्पष्टीकरण मे अपर सत्र न्यायाधीश सतीश चंद्र द्विवेदी ने स्वीकार किया कि आरोपी के खिलाफ दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ना के साक्ष्य मौजूद थे और मृतका की शादी को सात वर्ष पूरे नहीं हुए. उन्होंने यह भी माना कि धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान लागू होता था. हालांकि, उन्होंने कहा कि पति को उसकी सास और ससुर को मिली जमानत के आधार पर समानता के सिद्धांत पर जमानत दी गई.

हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना. हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित जज ने जमानत देने के अपने विवेक का ‘मनमाने ढंग से प्रयोग’ किया. हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत देने के तरीके से न्यायिक विवेक के इस्तेमाल को लेकर संदेह पैदा होता है.

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह संबंधित जज की ईमानदारी या निष्ठा पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है. अदालत ने कहा कि मामले की प्रशासनिक स्तर पर जांच की आवश्यकता है. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि मामले को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाए, ताकि यह विचार किया जा सके कि पर्याप्त सामग्री और धारा 118 के तहत लागू अनुमान के बावजूद आरोपी पति को जमानत देने के लिए ‘गलत और मनमाने तरीके से अधिकार का प्रयोग’ करने को लेकर संबंधित जज के खिलाफ जांच आवश्यक है या नहीं. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के जमानत आदेश को ‘पूरी तरह गलत’ करार देते हुए आरोपी सतेंद्र उर्फ सोनू की जमानत रद्द कर दी और उसे 10 दिन के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया.

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-भारत एक्सप्रेस



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