प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि पुलिस सुरक्षा अब ‘स्टेटस सिंबल’ बन गई है. राज्य किसी विशेषाधिकृत वर्ग को नहीं बना सकता. पुलिस सुरक्षा मांगने वालों को अपने जीवन में वास्तविक खतरे को साबित करना होगा. उन्हें स्पष्ट बताना होगा कि किस तरह का खतरा है. खतरे का आकलन करने का काम प्रशासन का है, कोर्ट का नहीं.
अलीगढ़ के विकास चौधरी और सुशील चौधरी ने याचिका दायर की थी. उन्होंने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को निर्देश देने की मांग की कि उन्हें तुरंत सीआरपीएफ की सशस्त्र सुरक्षा दी जाए. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने तीन एफआईआर दर्ज कराई हैं. पहली एफआईआर उनके ईंट भट्ठे की दीवार और मजदूरों के घर तोड़ने से जुड़ी है. दूसरी फर्जी ट्रस्ट और दस्तावेजों से संबंधित है. तीसरी उनके मोबाइल फोन हैकिंग की है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई ऐसा स्पष्ट उदाहरण नहीं है जिससे साबित हो कि उनकी जान को खतरा है. एफआईआर में किसी व्यक्ति का नाम नहीं है जिसने उन्हें या उनके परिवार को मारने की धमकी दी हो.
शख्स को पहले से सुरक्षा उपलब्ध
कोर्ट ने पाया कि 6 अगस्त 2023 के आदेश से उन्हें पहले ही पुलिस की ओर से एक सुरक्षा गार्ड मिल चुका है. यह सुरक्षा सक्षम अधिकारियों के खतरे के आकलन के आधार पर दी गई है. इसलिए अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत नहीं है.
खंडपीठ (जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान) ने कहा कि पुलिस सुरक्षा कोई कानूनी या मौलिक अधिकार नहीं है. इसलिए कोर्ट इस मामले में कोई निर्देश नहीं देगा. आसन्न खतरे की स्थिति में राज्य पुलिस सुरक्षा दे सकता है, लेकिन यह पूरी तरह पारदर्शी और उचित प्रक्रिया से होना चाहिए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट खतरे का फैसला नहीं कर सकता. यह काम संबंधित अधिकारियों का है.
संविधान के सिद्धांतों का हवाला
कोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान लिखित है. इसकी प्रस्तावना में सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने तथा समान अवसर प्रदान करने का लक्ष्य है. राज्य को समाज में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाने की अनुमति नहीं है. ऐसा करना संविधान के न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन होगा. जनहित में व्यक्तिगत सुरक्षा देना जरूरी हो सकता है, लेकिन यह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए. अगर इसे कोर्ट में चुनौती दी जाए तो राज्य को अपना फैसला सही ठहराना होगा.
टैक्सपेयर्स के पैसे का दुरुपयोग
कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस सुरक्षा अब टैक्सपेयर्स के पैसे पर स्टेटस सिंबल बन गई है. इससे एक खास वर्ग तैयार हो रहा है, जो संविधान के खिलाफ है. याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया.
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-भारत एक्सप्रेस
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