Balmiki Jyanti : उत्तर प्रदेश सरकार ने 7 अक्टूबर को महर्षि बाल्मीकि जयंती के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है. यह निर्णय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 सितंबर को श्रावस्ती में आयोजित एक कार्यक्रम में लिया था. इसके बाद 3 अक्टूबर को शासन ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया. इस दिन सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और कॉलेजों में छुट्टी रहेगी, जबकि बैंक खुले रहेंगे. इस कदम को आगामी पंचायत और विधानसभा चुनावों के संदर्भ में दलित समुदाय को आकर्षित करने की भाजपा की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
वाल्मीकि समाज की पुरानी मांग और सरकार की स्वीकृति:
वर्ष 2017 में योगी सरकार बनने के बाद कई छुट्टियों को रद्द कर दिया गया था, जिनमें Balmiki Jyanti भी शामिल थी. इसके बाद से वाल्मीकि समाज ने इस जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की बहाली की मांग उठाई थी. 26 सितंबर को डॉ. आंबेडकर ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर यह मांग दोहराई. मुख्यमंत्री ने उनकी बात सुनी और तत्काल निर्णय लिया, जिसे वाल्मीकि समाज के सम्मान की स्वीकृति माना गया.
राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण:
भा.ज.पा. के वरिष्ठ नेता ने इस निर्णय को सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वाल्मीकि समाज भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल सांस्कृतिक कदम नहीं मानते. बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के इतिहास विभाग के प्रोफेसर सुशील पांडेय का कहना है कि Balmiki Jyanti को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर एक तीर से दो निशाने साधने जैसा है—वाल्मीकि समाज को सम्मान देना और विपक्ष के जातीय गठजोड़ को कमजोर करना.
दलित समाज की बढ़ती राजनीतिक भूमिका:
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी लगभग 21 प्रतिशत है, जिसमें वाल्मीकि समाज की हिस्सेदारी सवा दो करोड़ के आसपास मानी जाती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह समाज निर्णायक भूमिका में है. नगर निकायों, सफाई सेवाओं और सरकारी ठेकों से जुड़े कामों में वाल्मीकि समाज की बड़ी उपस्थिति है, और पिछले दशक में इसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं.
भा.ज.पा. की रणनीति और प्रतीकात्मक पहल:
भा.ज.पा. की रणनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है. दिसंबर 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में नवनिर्मित हवाई अड्डे का उद्घाटन किया और उसका नाम “महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा” रखा. इससे पहले इसका नाम “मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एयरपोर्ट” था. मोदी ने अपने भाषण में संस्कृत में वाल्मीकि के श्लोकों का उल्लेख करते हुए कहा था, “वाल्मीकि के बिना राम की कथा अधूरी है.” यह नामकरण केवल नाम बदलने का कदम नहीं था, बल्कि दलित समाज को हिंदू गौरव की कथा में बराबरी से स्थान देने की रणनीति का हिस्सा था.
इसी तरह, फरवरी 2023 में लखनऊ में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के मुख्य पंडाल का नाम भी महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया. योगी सरकार के कार्यकाल में वाल्मीकि मंदिरों में कौशल विकास केंद्र खोलने की घोषणा की गई थी. समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने कहा, “हम चाहते हैं कि वाल्मीकि समाज के युवा कौशल और शिक्षा से सशक्त बनें.”
दलित राजनीति में बदलाव और विपक्ष की प्रतिक्रिया:
भा.ज.पा. की रणनीति दलित राजनीति की पुरानी संरचना को चुनौती देती है, जिसे बहुजन समाज पार्टी ने 1990 के दशक में गढ़ा था. तब जाटव समाज पार्टी की रीढ़ था और अन्य दलित जातियां उसके साथ जुड़ी थीं. अब वही छोटे दलित समुदाय भा.ज.पा. की ओर आकर्षित हो रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय का कहना है, “भा.ज.पा. ने दलित समाज को ‘हिंदू पहचान’ के साथ जोड़ने का रास्ता निकाला है. वाल्मीकि समाज इस रणनीति का केंद्र है.”
विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी, ने इस निर्णय को चुनावी रणनीति करार दिया है. सपा के एक नेता ने कहा, “हर चुनाव से पहले भा.ज.पा. को किसी न किसी समुदाय की याद आ जाती है. जब सत्ता में होती है तो यही समाज उपेक्षित रहता है.” सपा प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी ने कहा, “भा.ज.पा. दलित समाज के नाम पर केवल प्रतीक राजनीति करती है. अवकाश देना या नाम बदलना पर्याप्त नहीं, उन्हें सामाजिक न्याय और आरक्षण के अधिकारों की सुरक्षा चाहिए.”
निष्कर्ष: ( Balmiki Jyanti )
आने वाले महीनों में यह तय होगा कि योगी सरकार का यह कदम दलित राजनीति में भा.ज.पा. की पकड़ मजबूत करेगा या विपक्ष अपने पीडीए गठबंधन के जरिए इस भावनात्मक समीकरण को पलट पाएगा. फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर वाल्मीकि समाज निर्णायक भूमिका में है और सत्ता के हर खिलाड़ी की निगाह अब उस पर टिकी है.
भारत एक्सप्रेस
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