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बाबू जगजीवन राम: देश के इकलौते रक्षा मंत्री, जिनकी रणनीति से कांप उठा था पाकिस्तान

1971 के युद्ध में बांग्लादेश निर्माण के सूत्रधार और देश को अन्न संकट से उबारने वाले बाबू जगजीवन राम की दूरदर्शिता और अतुलनीय प्रशासनिक क्षमता की पूरी कहानी.

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Edited by Vaibhav Gupta

बाबू जगजीवन राम, जिन्हें स्नेह से ‘बाबूजी’ कहा जाता था, भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से एक थे जिनकी काबिलियत पर विरोधी खेमों के नेता भी भरोसा करते थे. उनकी योग्यता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई, दोनों ने ही उन्हें रक्षा जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो सौंपा. वे भारत के दूसरे सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले रक्षा मंत्री रहे. उनके लंबे राजनीतिक जीवन में कभी उन्हें इस्तीफा नहीं देना पड़ा. यह उनके प्रशासनिक कौशल, निष्ठा और विश्वास के प्रतीक थे.

1971 के युद्ध में निर्णायक भूमिका

जून 1970 में जगजीवन राम रक्षा मंत्री बने. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके नेतृत्व ने देश की सुरक्षा को नई दिशा दी. उन्होंने सशस्त्र बलों की तैयारी, रणनीति और मनोबल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. युद्ध के दौरान उन्होंने संसद में स्पष्ट घोषणाएं कीं कि यदि युद्ध थोपा गया तो वह दुश्मन की भूमि पर लड़ा जाएगा. उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने ऐतिहासिक विजय हासिल की, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ.

सेना के अधिकारियों ने भी उनकी दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता की सराहना की. वे सिर्फ रणनीति नहीं बनाते थे, बल्कि जवानों के कल्याण और आवश्यकताओं पर भी विशेष ध्यान देते थे. युद्ध के बाद भी उन्होंने पुनर्वास और राहत कार्यों की निगरानी जारी रखी.

मोरारजी देसाई के साथ सहयोग

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो मोरारजी देसाई ने जगजीवन राम को न केवल कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी (कांग्रेस-ओ से जुड़े) के प्रतिनिधि के रूप में शामिल किया, बल्कि उन्हें फिर से रक्षा मंत्रालय सौंपा. बाद में जनवरी 1979 में वे उप-प्रधानमंत्री भी बने और रक्षा मंत्री का पद सरकार गिरने तक संभाला. यह उनके प्रति व्यापक राजनीतिक विश्वास का प्रमाण था.

कृषि मंत्रालय और अनाज संकट से निजात

1974 में देश गंभीर सूखे और अनाज संकट से जूझ रहा था. इंदिरा गांधी ने जगजीवन राम से आग्रह किया कि वे रक्षा मंत्रालय छोड़कर कृषि एवं सिंचाई मंत्रालय संभालें. वे इस चुनौती को स्वीकार करने में शुरू में झिझक रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री के आग्रह पर सहमत हो गए.

उनके पास हरित क्रांति का पुराना अनुभव था. 1967-70 में कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने उच्च उपज वाली किस्मों, सिंचाई, उर्वरकों और किसानों के समर्थन मूल्य जैसी नीतियों को मजबूत किया था. 1974-77 के कार्यकाल में उन्होंने इन्हीं प्रयासों को आगे बढ़ाया. उनके कुशल प्रबंधन से देश अनाज संकट से बाहर निकला और खाद्य सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई.

लंबे प्रशासनिक अनुभव का सार

जगजीवन राम लगभग तीन दशक तक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रहे, यह रिकॉर्ड आज भी कायम है. श्रम, संचार, रेलवे, कृषि और रक्षा जैसे अलग-अलग विभागों में उन्होंने अपनी क्षमता सिद्ध की. वे न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों के भी प्रबल समर्थक रहे.

उनकी कहानी सिर्फ पदों की नहीं, बल्कि योग्यता, विश्वास और राष्ट्र सेवा की है. इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं द्वारा उन्हें बार-बार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपना इस बात का प्रमाण है कि सच्ची काबिलियत राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर पहचानी जाती है. बाबू जगजीवन राम का योगदान भारतीय राजनीति और प्रशासन के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा.

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-भारत एक्सप्रेस



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