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अमीरी और अशांति के बीच फंसा बलोचिस्तान, जानिए पाकिस्तान के इस सबसे बड़े सूबे की कहानी

बलोचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों, विशाल पहाड़ों और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह के लिए जाना जाता है. इसके बावजूद यहां के लोग दशकों से राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक हिस्सेदारी और अपनी अलग पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं. आखिर बलोचिस्तान में असंतोष की जड़ें कितनी गहरी हैं और क्यों यह इलाका पाकिस्तान के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है?

पाकिस्तान के नक्शे पर एक ऐसा इलाका है, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और अलग पहचान की मांग से जूझ रहा है. इस क्षेत्र का नाम है बलोचिस्तान. विशाल पहाड़ों, रेगिस्तानों और समुद्री तटों से घिरा यह प्रांत सिर्फ भौगोलिक लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका इतिहास भी संघर्षों और अधूरी राजनीतिक आकांक्षाओं से भरा हुआ है.

करीब 3.5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला बलोचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है. हालांकि, यहां की आबादी देश के दूसरे बड़े प्रांतों के मुकाबले काफी कम है. इसकी सीमा ईरान और अफगानिस्तान से लगती है, जबकि दक्षिण में अरब सागर है. यहां का ग्वादर बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सामरिक गतिविधियों के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है. इसके अलावा, इलाके में तेल, गैस और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार भी मौजूद हैं. इसकी राजधानी क्वेटा है.

लेकिन सवाल यह है कि इतनी प्राकृतिक संपदा होने के बावजूद बलोचिस्तान के लोग लंबे समय से असंतोष क्यों जाहिर करते रहे हैं? इसका जवाब समझने के लिए इस क्षेत्र के इतिहास और यहां के लोगों की राजनीतिक पहचान को जानना जरूरी है.

बलोचों का इतिहास कितना पुराना है?

बलोच समुदाय का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. सदियों तक यहां अलग-अलग जनजातियां अपने पारंपरिक नेताओं के नेतृत्व में शासन और सामाजिक व्यवस्था चलाती रहीं. बलोचों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं. कुछ ऐतिहासिक और भाषाई अध्ययनों में उनका संबंध ईरानी भाषाई समुदायों से जोड़ा जाता है.

प्राचीन इतिहास में भी इस क्षेत्र का जिक्र मिलता है. माना जाता है कि 325 ईसा पूर्व में सिकंदर महान जब भारत अभियान से लौटते हुए मकरान के रेगिस्तानी इलाके से गुजर रहा था, तब उसकी सेना को स्थानीय कबीलों के विरोध और हमलों का सामना करना पड़ा था. हालांकि, इन घटनाओं के कुछ विवरण ऐतिहासिक स्रोतों और लोककथाओं पर आधारित हैं.

समय के साथ बलोच समुदाय इस क्षेत्र में मजबूती से बस गया. 11वीं शताब्दी तक उनकी मौजूदगी यहां स्थापित हो चुकी थी. प्रसिद्ध फारसी कवि फिरदौसी ने अपने महाकाव्य शाहनामा में भी बलोच योद्धाओं का उल्लेख किया है. इससे पता चलता है कि उस दौर में भी इस समुदाय की पहचान एक लड़ाकू और स्वतंत्र स्वभाव वाले समाज के रूप में थी.

बलोचिस्तान में ब्राहुई समुदाय का इतिहास भी काफी दिलचस्प है. ब्राहुई भाषा द्रविड़ भाषा परिवार से जुड़ी हुई है. यही वजह है कि भाषाविदों और इतिहासकारों की इस क्षेत्र में विशेष दिलचस्पी रही है. आज भी ब्राहुई भाषा बोलने वाले लोग मुख्य रूप से कलात और उसके आसपास के इलाकों में रहते हैं.

कलात रियासत से ब्रिटिश शासन तक का सफर

18वीं शताब्दी में कलात बलोचिस्तान की राजनीति और सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया था. यहां के खान का प्रभाव आसपास की कई जनजातियों और इलाकों तक फैला हुआ था. हालांकि, पूरे क्षेत्र पर उनका नियंत्रण हमेशा एक जैसा नहीं रहा. अलग-अलग कबीलों के अपने नेता और हित थे, जिनकी वजह से बलोचिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था काफी हद तक जनजातीय संबंधों पर निर्भर करती थी.

ब्रिटिश शासन का प्रभाव इस इलाके में 1839 के आसपास बढ़ना शुरू हुआ. उस समय अंग्रेज अफगानिस्तान की ओर बढ़ रहे थे और उन्हें बलोचिस्तान से होकर गुजरने वाले रास्तों की जरूरत थी. इसी दौरान अंग्रेजों ने कलात के शासकों के साथ समझौते किए. साल 1876 में हुई संधि ने इस रिश्ते को नया रूप दिया. इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों का कलात की राजनीति और प्रशासन में दखल बढ़ता चला गया.

अंग्रेजों ने क्वेटा को अपने सैन्य और प्रशासनिक हितों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनाया. धीरे-धीरे बलोचिस्तान का एक हिस्सा सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया, जबकि कलात, मकरान, खारान और लास बेला जैसी रियासतों को अलग-अलग व्यवस्थाओं के तहत रखा गया.

कलात के खान को आंतरिक मामलों में कुछ अधिकार जरूर मिले हुए थे, लेकिन उनकी आजादी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थी. ब्रिटिश अधिकारियों की निगरानी और राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार बना रहता था. इस तरह बलोचिस्तान में एक ऐसी व्यवस्था विकसित हुई, जिसमें स्थानीय शासकों का अस्तित्व तो कायम रहा, लेकिन असली रणनीतिक फैसलों पर अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ता गया.

1947 के बाद बलोचिस्तान में क्यों बढ़ा असंतोष?

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का गठन हुआ, तब बलोचिस्तान के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे. कलात के खान मीर अहमद यार खान स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना चाहते थे. उन्होंने अगस्त 1947 में कलात की स्वतंत्रता की घोषणा की.

हालांकि, उस समय बलोचिस्तान आज की तरह एक ही प्रशासनिक इकाई नहीं था. यहां कलात रियासत के अलावा कई दूसरी रियासतें और ब्रिटिश प्रशासन के अधीन क्षेत्र भी मौजूद थे. इसलिए सभी इलाकों का पाकिस्तान में शामिल होना एक ही प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ.

कलात के पाकिस्तान में विलय को लेकर बातचीत लंबे समय तक चली. आखिरकार मार्च 1948 में खान ने पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए. लेकिन इस फैसले को लेकर बलोच राजनीतिक नेतृत्व और स्थानीय लोगों के एक हिस्से में नाराजगी बनी रही. खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस विलय का विरोध करते हुए सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया. इसे पाकिस्तान के खिलाफ बलोचिस्तान का पहला बड़ा विद्रोह माना जाता है.

यहां से बलोचिस्तान और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव का एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसका असर आने वाले दशकों तक दिखाई दिया. बलोच राष्ट्रवादी नेताओं के बीच अपनी अलग पहचान, राजनीतिक अधिकार और स्थानीय स्वायत्तता की मांग लगातार मजबूत होती गई.

1970 के दशक में संघर्ष ने लिया हिंसक रूप

बलोचिस्तान में असंतोष की आग 1970 के दशक में एक बार फिर तेज हो गई. साल 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार ने बलोचिस्तान की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद केंद्र सरकार और बलोच राष्ट्रवादी संगठनों के बीच टकराव बढ़ गया.

स्थिति इतनी बिगड़ी कि कई इलाकों में हथियारबंद संघर्ष शुरू हो गया. पाकिस्तानी सेना ने विद्रोह को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया. इस दौरान हवाई हमलों और सैन्य कार्रवाई की खबरें भी सामने आईं. कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों और पत्रकारिता रिपोर्टों में ईरान की ओर से पाकिस्तान को सैन्य सहायता दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है.

इस संघर्ष में दोनों पक्षों के लड़ाकों के साथ आम नागरिकों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, मरने वालों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं और इस पर कोई सर्वमान्य आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

1977 तक आते-आते यह विद्रोह काफी हद तक कमजोर पड़ गया. लेकिन सैन्य कार्रवाई के बाद भी बलोचिस्तान में राजनीतिक असंतोष खत्म नहीं हुआ. लोगों के बीच यह सवाल बना रहा कि उनके इलाके के फैसले आखिर कौन लेगा और प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले आर्थिक लाभ में स्थानीय आबादी की कितनी हिस्सेदारी होगी.

अकबर बुगती की मौत और फिर भड़का आंदोलन

बलोचिस्तान में संघर्ष की कहानी 1970 के दशक के बाद भी खत्म नहीं हुई. समय-समय पर यहां अलगाववादी आंदोलन और पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते रहे. स्थानीय नेताओं की प्रमुख शिकायत रही है कि बलोचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, लेकिन उसका पर्याप्त आर्थिक फायदा स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच रहा.

इस विवाद में प्राकृतिक गैस, खनिज, तांबा और सोने के भंडार के साथ-साथ ग्वादर बंदरगाह भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है. स्थानीय राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप है कि बड़े विकास परियोजनाओं में स्थानीय आबादी की भागीदारी सीमित रखी जाती है और उन्हें रोजगार तथा आर्थिक अवसरों का अपेक्षित लाभ नहीं मिलता.

साल 2006 में बलोचिस्तान के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर खान बुगती की सैन्य अभियान के दौरान मौत हो गई. उनकी मौत के बाद क्षेत्र में विरोध और हिंसा की घटनाओं में तेजी आई. बुगती की मौत बलोच राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है.

इसके बाद भी कई राजनीतिक नेताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों ने स्थानीय अधिकारों, संसाधनों पर हिस्सेदारी और अधिक स्वायत्तता की मांग उठाई. वहीं, पाकिस्तान सरकार का कहना रहा है कि देश की एकता और सुरक्षा के लिए बलोचिस्तान में स्थिरता जरूरी है.

भारत की भूमिका को लेकर भी होती रही है चर्चा

बलोचिस्तान का मुद्दा सिर्फ पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहा. भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भी इसका जिक्र समय-समय पर होता रहा है.

मूल लेख में दावा किया गया है कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत ने बलोच और पश्तून राजनीतिक आंदोलनों को आर्थिक, राजनयिक और अन्य प्रकार की सहायता दी थी. इसमें यह भी कहा गया है कि 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद भारत की पाकिस्तान नीति में बलोचिस्तान और दूसरे क्षेत्रीय आंदोलनों को लेकर अलग सोच थी. हालांकि, भारत की ओर से बलोच लड़ाकों को प्रशिक्षण देने और सहायता पहुंचाने जैसे दावों को स्वतंत्र रूप से स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में पेश करने से पहले ठोस प्रमाणों की जरूरत है.

1977 में इंदिरा गांधी की सत्ता से विदाई के बाद भारत की विदेश नीति में बदलाव आया. जनता पार्टी की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने. इस दौरान पाकिस्तान के साथ संबंध सामान्य करने की कोशिशों को प्राथमिकता दी गई. मूल लेख के अनुसार, इसी प्रक्रिया में पाकिस्तान के भीतर चल रहे विभिन्न क्षेत्रीय आंदोलनों को भारत का पहले जैसा समर्थन नहीं मिला.

आखिर बलोचिस्तान की समस्या का समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा?

आज बलोचिस्तान को समझने के लिए सिर्फ वहां चल रहे विद्रोह या सुरक्षा संबंधी घटनाओं पर नजर डालना पर्याप्त नहीं है. इसके पीछे दशकों पुराना राजनीतिक विवाद, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक असमानता और संसाधनों पर अधिकार जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं.

एक तरफ पाकिस्तान सरकार इस इलाके को देश की आर्थिक और सामरिक व्यवस्था का अहम हिस्सा मानती है. दूसरी तरफ बलोच राष्ट्रवादी संगठनों का कहना है कि स्थानीय लोगों को अपने भविष्य और प्राकृतिक संपदा से जुड़े फैसलों में अधिक अधिकार मिलने चाहिए.

ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे जैसी परियोजनाओं ने बलोचिस्तान का अंतरराष्ट्रीय महत्व और बढ़ा दिया है. लेकिन विकास परियोजनाओं की सफलता सिर्फ बड़े निवेश और निर्माण कार्यों से तय नहीं होती. स्थानीय लोगों की भागीदारी, रोजगार, शिक्षा, बुनियादी सुविधाएं और राजनीतिक विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं.



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