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जानिए आखिर कौन थे भारतेंदु हरिश्चंद्र, जिनकी रचनाएं आज भी हैं प्रासंगिक?

भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य के उन साहित्यकारों में शामिल हैं, जिन्होंने साहित्य को समाज और देश की चिंताओं से जोड़ा है. 9 सितंबर 1850 को काशी में जन्मे भारतेंदु ने नाटक, कविता, पत्रकारिता और निबंध के माध्यम से अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को आवाज दी.

हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका असर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है. उन्होंने अपने समय के समाज, राजनीति और देश की हालत पर सवाल उठाए और लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया. भारतेंदु हरिश्चंद्र भी ऐसे ही साहित्यकार थे. उनकी जयंती पर उन्हें याद करना दरअसल उस दौर को याद करना है, जब हिंदी साहित्य में बदलाव की एक नई लहर उठ रही थी.

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी, यानी आज के वाराणसी, में एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था. हिंदी साहित्य में उन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह’ कहा जाता है. ‘भारतेंदु’ की उपाधि भी उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के कारण मिली. हैरानी की बात यह है कि जिस उम्र में आज के युवा अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं, उस उम्र से भी कम समय में भारतेंदु ने ऐसा साहित्य रचा, जिसका प्रभाव आज तक दिखाई देता है. उनका निधन महज 34 वर्ष की उम्र में 6 जनवरी 1885 को हुआ.

भारतेंदु के पिता गोपालचंद्र ‘गिरधरदास’ नाम से कविता लिखते थे. बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया, लेकिन इस कठिन परिस्थिति ने उनकी सीखने की इच्छा को कम नहीं किया. उन्होंने अपने दम पर कई भाषाओं का अध्ययन किया. अंग्रेजी, संस्कृत, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी और उर्दू जैसी भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी.

महज 15 वर्ष की उम्र में जगन्नाथ पुरी की यात्रा के दौरान उन्हें बंगाल में चल रहे नवजागरण और सामाजिक बदलावों के बारे में जानने का अवसर मिला. इस अनुभव ने उनके विचारों और लेखन को गहराई से प्रभावित किया. इसके बाद उनकी रचनाओं में साहित्य के साथ समाज और देश की चिंता भी साफ दिखाई देने लगी.

नाटक से लेकर पत्रकारिता तक, हर क्षेत्र में छाप

भारतेंदु ने हिंदी की लगभग हर प्रमुख साहित्यिक विधा में काम किया. उन्होंने नाटक, कविता, निबंध, पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रचनाएं दीं. उनके साहित्यिक योगदान के कारण 1850 से 1900 के बीच के समय को हिंदी साहित्य में ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जाना जाता है.

हिंदी को सरल और आम लोगों के करीब लाने में भी उनका बड़ा योगदान रहा. उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को साहित्य की भाषा के रूप में मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई. उनकी कोशिश थी कि साहित्य केवल कठिन शब्दों और सीमित पाठकों तक सिमटकर न रह जाए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं से जुड़े और लोगों तक आसानी से पहुंचे.

‘अंधेर नगरी’ आज भी क्यों याद आती है?

भारतेंदु की सबसे चर्चित रचनाओं में ‘अंधेर नगरी’ का नाम सबसे ऊपर आता है. वर्ष 1881 में लिखे गए इस व्यंग्य नाटक में उन्होंने शासन व्यवस्था की अव्यवस्था और मूर्खतापूर्ण फैसलों पर तीखा कटाक्ष किया. “अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी, टका सेर खाजा” जैसी पंक्ति आज भी आम बोलचाल में सुनाई देती है.

‘भारत दुर्दशा’ में उन्होंने गुलामी, गरीबी और देश की बदहाल स्थिति को सामने रखा. इसके अलावा ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘नीलदेवी’, ‘प्रेमजोगिनी’ और ‘चंद्रावली’ जैसे नाटकों ने हिंदी रंगमंच और साहित्य को समृद्ध किया.

उनकी कविताओं में प्रेम और भक्ति के साथ देशप्रेम की भावना भी दिखाई देती है. ‘प्रेममालिका’, ‘प्रेम माधुरी’, ‘प्रेम-तरंग’, ‘फूलों का गुच्छा’, ‘वर्षा-विनोद’ और ‘भक्तसर्वस्व’ उनकी चर्चित कृतियों में शामिल हैं. हास्य और व्यंग्य के जरिए भी उन्होंने समाज की विसंगतियों पर चोट की. ‘बंदर सभा’ और ‘बकरी विलाप’ इसके अच्छे उदाहरण हैं.

पत्रकारिता को बनाया बदलाव का माध्यम

भारतेंदु सिर्फ साहित्य लिखकर रुक नहीं गए. उन्होंने पत्रकारिता को भी सामाजिक जागरूकता का हथियार बनाया. महज 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका निकाली. बाद में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन/पत्रिका’ और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली ‘बालबोधिनी’ का संपादन भी किया.

उनके लिए पत्रकारिता का मतलब केवल खबरें या साहित्य प्रकाशित करना नहीं था. वह चाहते थे कि पत्र-पत्रिकाओं के जरिए लोगों में शिक्षा, सामाजिक चेतना और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा हो.

समाज सुधार और देशहित की चिंता

भारतेंदु के लेखन में अपने समय की समस्याओं की स्पष्ट झलक मिलती है. उन्होंने स्त्री शिक्षा का समर्थन किया और सामाजिक कुरीतियों पर सवाल उठाए. अंग्रेजी शासन की नीतियों, गरीबी और शोषण पर भी उन्होंने खुलकर लिखा. हिंदी-उर्दू विवाद जैसे मुद्दों पर भी उनकी अपनी स्पष्ट राय थी.

उनकी रचनाओं में आधुनिक शिक्षा और नई तकनीक के प्रति सकारात्मक नजरिया दिखाई देता है. वह परंपरा को पूरी तरह खारिज करने के बजाय समाज में सुधार और आधुनिक सोच के बीच संतुलन की जरूरत समझते थे.

भारतेंदु हरिश्चंद्र को गुजरे हुए एक सदी से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन उनकी रचनाओं के सवाल आज भी कई जगह प्रासंगिक नजर आते हैं. ‘अंधेर नगरी’ की व्यवस्था पर चोट हो या ‘भारत दुर्दशा’ में देश की हालत को लेकर चिंता—उनकी कलम अपने समय से आगे की बेचैनी दिखाती थी.

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-भारत एक्सप्रेस



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