देहरादून से आई एक बेहद दुखद खबर ने पूरे उत्तराखंड और देश की राजनीति को शोक में डाल दिया है. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय सेना के वरिष्ठ पूर्व अधिकारी मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खंडूरी का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने लंबे समय से चल रही बीमारी के बाद देहरादून में अंतिम सांस ली. उनके जाने से सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व का अंत हुआ है जिसे ईमानदारी, अनुशासन और विकास-केन्द्रित सोच के लिए जाना जाता था.
सेना से लेकर राजनीति तक अनुशासन की मिसाल
1 अक्टूबर 1934 को पौड़ी गढ़वाल में जन्मे खंडूरी जी का शुरुआती जीवन भारतीय सेना में बीता. उन्होंने सेना में मेजर जनरल के पद तक पहुंचकर देश की सेवा की और अति विशिष्ट सेवा पदक (AVSM) जैसे सम्मान भी हासिल किए. सेना में सीखी गई अनुशासन और निर्णय लेने की क्षमता का असर उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा में साफ दिखाई देता रहा.
सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा, लेकिन उनकी कार्यशैली हमेशा एक सख्त और व्यवस्थित अफसर जैसी ही रही.
अटल सरकार में सड़क क्रांति के सूत्रधार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भुवन चंद्र खंडूरी को भूतल परिवहन मंत्री की जिम्मेदारी मिली. इसी दौरान देश में बड़े पैमाने पर सड़क विकास की नींव मजबूत हुई. खासकर ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ परियोजना को आगे बढ़ाने में उनका अहम योगदान माना जाता है.
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली इस योजना ने देश की आर्थिक रफ्तार को नई दिशा दी. इसके साथ ही नेशनल हाईवे नेटवर्क और उत्तर-दक्षिण व पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर के विस्तार में भी उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही.
इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के जरिए गांवों तक पक्की सड़कों का जाल बिछाने में भी उनका योगदान ऐतिहासिक रहा. इस योजना ने दूर-दराज के इलाकों को शहरों से जोड़कर ग्रामीण जीवन में बड़ा बदलाव लाया.
खंडूरी की कार्यशैली की सबसे बड़ी पहचान उनकी तेज निर्णय क्षमता थी. एक बार एक साधारण बातचीत के दौरान सड़क सुरक्षा से जुड़ी समस्या सामने आई तो उन्होंने तुरंत संज्ञान लिया और कुछ ही दिनों में नियम बदलकर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के पीछे लाइट लगाना अनिवार्य कर दिया. ऐसे कई उदाहरण उनकी “एक्शन-ओरिएंटेड” सोच को दर्शाते हैं.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भी छाप छोड़ी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने दो बार 2007 से 2009 और फिर 2011 से 2012 तक राज्य की कमान संभाली. इन दोनों कार्यकालों में उन्होंने पारदर्शिता, विकास और भ्रष्टाचार पर सख्ती को अपनी पहचान बनाया. उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही जो दिखावे से दूर रहकर काम पर भरोसा करता था.
भुवन चंद्र खंडूरी का जाना सिर्फ एक राजनीतिक नेता का जाना नहीं है, बल्कि उस सोच का अंत है जिसने भारत के सड़क नेटवर्क और बुनियादी ढांचे की मजबूत नींव रखी. उनकी सादगी, ईमानदारी और देश के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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