24 जनवरी 1966, यह वह तारीख है जब भारत ने अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम के प्रमुख स्तंभ को खो दिया. होमी जहांगीर भाभा का निधन एयर इंडिया फ्लाइट 101 के क्रैश में हुआ, जिसमें कुल 117 लोगों की जान गई. यह हादसा फ्रांस के आल्प्स पर्वत श्रृंखला में मॉन्ट ब्लांक के पास हुआ, जब बोइंग 707 विमान मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहा था. आधिकारिक जांच के अनुसार, खराब मौसम और पायलट-एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच संचार में गड़बड़ी के कारण विमान रास्ते से भटक गया और पहाड़ से टकरा गया.
एक बहुमुखी प्रतिभा का उदय
होमी भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई के एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ था. उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भौतिकी में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की. वे न केवल एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक थे, बल्कि कला, संगीत और साहित्य में भी रुचि रखते थे. नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन उन्हें “भारत का लियोनार्डो द विंची” कहा करते थे, क्योंकि उनकी प्रतिभा बहुआयामी थी.
भाभा ने कॉस्मिक रेज (Cosmic Rays) पर महत्वपूर्ण शोध किया और 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की, जो आज भी भारत का प्रमुख रिसर्च संस्थान है. वे 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे और भारत सरकार में सचिव के पद पर भी कार्यरत थे.
सिर्फ 18 महीने में तैयार हो जाता बम
भाभा भारतीय न्यूक्लियर कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं. उन्होंने परमाणु ऊर्जा को देश की सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, कृषि और चिकित्सा के लिए आवश्यक बताया. 1964 में चीन के पहले न्यूक्लियर टेस्ट के बाद, भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर उन्हें सरकार की मंजूरी मिली, तो भारत 18 महीने में परमाणु बम बना सकता है. यह बयान उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाला था, क्योंकि यह भारत की न्यूक्लियर क्षमता को दर्शाता था.
कई इतिहासकार मानते हैं कि अगर भाभा जीवित रहते, तो भारत का न्यूक्लियर कार्यक्रम और तेजी से आगे बढ़ता, और शायद 1974 के पोखरण टेस्ट से पहले ही कई उपलब्धियां हासिल हो जातीं.
साजिश के आरोप
भाभा की मौत के बाद से ही साजिश के सिद्धांत (conspiracy theories) चर्चा में रहे हैं. सबसे प्रमुख आरोप अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA पर लगा है. 2008 में प्रकाशित किताब “Conversations with the Crow” में पत्रकार ग्रेगरी डगलस ने पूर्व CIA अधिकारी रॉबर्ट क्राउली के साथ कथित बातचीत प्रकाशित की. किताब के अनुसार, क्राउली ने स्वीकार किया कि CIA ने भाभा के विमान में कार्गो होल्ड में बम लगाकर हादसा करवाया, ताकि भारत का न्यूक्लियर कार्यक्रम रुक जाए.
यह आरोप 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की जीत और चीन के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद अमेरिका की चिंता से जोड़ा जाता है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि भाभा की मौत के साथ ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत (ताशकंद में) को भी CIA से जोड़ा जाता है. हालांकि, ये दावे किताब पर आधारित हैं और आधिकारिक रूप से कभी सिद्ध नहीं हुए.
आधिकारिक जांच (फ्रांसीसी और भारतीय) ने इसे दुर्घटना ही माना. कोई ठोस सबूत साजिश के पक्ष में नहीं मिला, लेकिन यह थ्योरी भारतीय मीडिया, किताबों और वेब सीरीज (जैसे “Rocket Boys”) में आज भी जीवित है.
सादगी और नेहरू से नजदीकी
भाभा बेहद सादगी पसंद थे. वे कभी भी अपने चपरासी से ब्रीफकेस नहीं उठवाते थे. वे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बहुत करीब थे और उन्हें “भाई” कहकर पुकारते थे. नेहरू ने भाभा के न्यूक्लियर विजन को पूरा समर्थन दिया था.
होमी भाभा की मौत ने भारत को एक बड़े वैज्ञानिक से वंचित कर दिया, लेकिन उनका योगदान आज भी TIFR, BARC और भारतीय न्यूक्लियर कार्यक्रम में जीवित है. उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि कैसे एक व्यक्ति के सपने पूरे राष्ट्र की दिशा बदल सकते हैं.
ये भी पढ़ें: 355 वोट और एक नया इतिहास: लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद कैसे ‘गूंगी गुड़िया’ से ‘आयरन लेडी’ बनीं इंदिरा
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


