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355 वोट और एक नया इतिहास: लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद कैसे ‘गूंगी गुड़िया’ से ‘आयरन लेडी’ बनीं इंदिरा

19 जनवरी 1966 का दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक क्रांतिकारी मोड़ था. लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद उपजे राजनीतिक शून्य को भरने के लिए कांग्रेस के भीतर पहली बार गुप्त मतदान के जरिए चुनावी जंग हुई. एक तरफ अनुभवी मोरारजी देसाई थे, तो दूसरी तरफ नेहरू की विरासत संभाल रहीं इंदिरा गांधी.

Indira Gandhi first PM
Edited by Vaibhav Gupta

19 जनवरी 1966 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है. इस दिन इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. यह उपलब्धि न केवल लैंगिक समानता की दिशा में एक मील का पत्थर थी, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भीतर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में एक अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा का प्रतीक भी बनी.

लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु

जनवरी 1966 की शुरुआत में भारत एक गंभीर संकट से गुजर रहा था. प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 11 जनवरी को ताशकंद में अचानक मृत्यु हो गई थी. शास्त्री जी ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उसी रात उनकी रहस्यमयी मृत्यु ने देश को स्तब्ध कर दिया. गुलजारीलाल नंदा ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पद संभाला, लेकिन स्थायी नेता की आवश्यकता थी.

कांग्रेस, जो उस समय केंद्र में सत्ता में थी, को जल्दबाजी में अपना नया नेता चुनना था. जवाहरलाल नेहरू की एकमात्र संतान इंदिरा गांधी शुरू से ही मजबूत दावेदार मानी जा रही थीं. उन्हें पार्टी अध्यक्ष के. कामराज, 11 राज्यों के मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसदों के बहुमत का समर्थन प्राप्त था लेकिन स्थिति आसान नहीं थी.

मोरारजी देसाई की इंट्री और चुनावी मुकाबला

पार्टी के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई (पूर्व वित्त मंत्री) ने अचानक दावेदारी पेश कर दी. देसाई एक कट्टर, अनुशासित और गांधीवादी विचारधारा के नेता थे, जो नेहरू के समय से ही सत्ता के दावेदार माने जाते थे. उन्होंने पार्टी के भीतर खुली चुनौती दी, जिससे कांग्रेस संसदीय दल (CPP) में पहली बार स्वतंत्र मतदान के जरिए नेता चुना जाना तय हुआ.

यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस के लिए पहला ऐसा खुला और कड़ा मुकाबला था. पहले नेहरू और फिर शास्त्री के बाद उत्तराधिकार आमतौर पर बिना चुनाव के तय हो जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

19 जनवरी 1966 को संसद के सेंट्रल हॉल में मतदान हुआ हॉल में भारी उत्साह और तनाव का माहौल था.

  • इंदिरा गांधी का नाम कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने प्रस्तावित किया और संजीव रेड्डी ने समर्थन दिया.
  • मोरारजी देसाई का नाम के. हनुमंतैया ने प्रस्तावित किया.

मतगणना चार घंटे तक चली शाम करीब 3 बजे रिटर्निंग अधिकारी ने घोषणा की:

“मैं श्रीमती गांधी को निर्वाचित घोषित करती हूं”.

परिणाम थे:

  • इंदिरा गांधी: 355 वोट
  • मोरारजी देसाई: 169 वोट

इंदिरा गांधी की पृष्ठभूमि और महत्व

इंदिरा गांधी जवाहरलाल नेहरू की बेटी होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से परिपक्व थीं. उन्होंने 1964-66 तक शास्त्री सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में काम किया था. 1959-60 में वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुकी थीं पार्टी के कई नेता उन्हें “कमजोर” या “नियंत्रण में रखने योग्य” मानते थे, लेकिन यह धारणा बाद में गलत साबित हुई.

उनकी जीत के बाद 24 जनवरी 1966 को राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई.

ऐतिहासिक महत्व

  • भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर इंदिरा गांधी ने विश्व स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई ऊंचाई दी.
  • यह कांग्रेस के भीतर पहला और आखिरी ऐसा खुला चुनाव था जहां सांसदों ने गुप्त मतदान से नेता चुना.
  • इस घटना ने बाद की राजनीति को प्रभावित किया. इंदिरा ने बाद में पार्टी पर मजबूत पकड़ बनाई और “सिंडिकेट” (पार्टी के पुराने नेता) को कमजोर किया.

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-भारत एक्सप्रेस



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