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जब गौरैया को खत्म कर अकाल की चपेट में आ गया था चीन; जानिए क्यों खास है यह ‘नन्ही सिपाही’

घरेलू गौरैया, जिसे पास्सर डोमेस्टिकस (House Sparrow) कहा जाता है, हमारे घरों और बस्तियों में सदियों से इंसानों की साथी रही है. कभी घर के आंगन में फुदकती और छोटे कीड़े-मकोड़े खाकर जीवनयापन करने वाली यह चिड़िया अब कम दिखाई देती है.

बचपन में घर के आंगन में गौरैया को देखकर लोग बड़े हुए हैं. इस चिड़िया के बारे में बहुत प्यारी यादें सबके जहन में हैं. दुर्भाग्य से घरेलू गौरैया अब एक लुप्त प्रजाति होती जा रही है. अपने हैबिटेट में इनकी संख्या का घटना चिंता की बात है. हमारे आसपास से इसका गायब हो जाना एक चेतावनी भी है जो हमारे स्वास्थ्य, असंतुलित हो रही बायोडायवर्सिटी और पारिस्थितिकी तंत्र की ओर हमें सचेत करती है.

कभी घर के आंगन में फुदकते हुए आना, चींचीं और चकचक कर इधर उधर से कुछ भी खा जाना और फिर थोड़ी सी आहट होते ही झुंड के साथ फुर्र उड़कर घर की मुड़ेल पर बैठ जाने वाली गौरैया चिड़िया अब बहुत कम दिखती है. इंसानों के साथ गौरैया का सदियों पुराना रिश्ता है लेकिन अब बहुत कम दिखना हमारे आसपास के पर्यावरण में निरंतर हो रहे गिरावट के संकेत हैं.

घर के पंखे, छत की कड़ियों और दीवार के छोटे से छेद में अपना घर बनाने वाली घरेलू गौरैया अब घर आंगन और बस्तियों से दूर हो चुकी है. क्योंकि इंसानों ने अपने लालच के कारण इनके हैबिटेट और फूड चेन सिस्टम को तोड़ दिया है. गांव में तो कभी-कभी गौरैया मिल भी जाती है लेकिन शहरों में तो गौरैया नदारत ही हो गई है.

गौरैया का वैज्ञानिक नाम पास्सर डोमेस्टिकस (हाउस स्पैरो) है और इंसानों की पुरानी साथी भी है. घर के आसपास बचा खाना और बिखरे खाद्यान्न और कीड़े मकोड़े खाकर जीवित रहती है. हालांकि आईयूसीएन रेड लिस्ट में अभी सबसे कम चिंताजनक पक्षी के रूप में सूचीबद्ध है. लेकिन इंसानों के बीच इसकी दूरी इंसानों ने ही पैदा की है.

भारत और फ्रांस के सहयोग से संरक्षण अभियान

भारत की नेचर फॉरएवर सोसाइटी, नासिक और इको-सिस एक्शन फाउंडेशन (फ्रांस) ने मिलकर वर्ष 2010 में गौरैया के संरक्षण के प्रति अभियान चलाते हुए 20 मार्च को पहला विश्व गौरैया दिवस मनाया था. इस सोसाइटी की स्थापना नासिक निवासी पक्षियों के संरक्षण प्रेमी डॉ. मोहम्मद दिलावर ने की थी. सोसाइटी की पहल के बाद विश्व गौरैया दिवस 2010 से हर साल 20 मार्च को दुनिया भर के 50 से अधिक देशों में गौरैया दिवस मनाया जाता है जो की यूरोप और दक्षिण एशिया में बहुत ही अधिक लोकप्रिय है. इस वर्ष 2025 में गौरैया दिवस की थीम ‘प्रकृति के नन्हें दूतों की श्रद्धांजलि’ है.

यही नहीं नेचर फॉरएवर सोसाइटी ने 20 मार्च 2011 को गुजरात के अहमदाबाद में स्पैरो पुरस्कार की शुरुआत भी शुरू की, जिससे कि पक्षियों का संरक्षण करने वाले लोगों और संस्थाओं को प्रोत्साहित किया जा सके. इसके बाद गौरैया के संरक्षण के लिए लोगों का ध्यान आकर्षित करने और संरक्षण की मुहिम में 2012 में शीला दीक्षित की दिल्ली सरकार ने इसे दिल्ली राज्य पक्षी घोषित किया था. इससे यह संकेत थे कि छोटी सी गौरैया पारिस्थितिकी तंत्र बनाए रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

1958 के ‘मारो चार’ अभियान में गौरैया का विनाश

पारिस्थितिकी तंत्र की छोटी सी सिपाही गौरैया के खिलाफ चीन में चर्चित चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ को भी गौरैया सफाया अभियान चलाकर उसकी प्रजाति को नष्ट करने के बाद बहुत पछताना पड़ा था. दरअसल 1958 में चीन में चलाए गए मारो चार अभियान में गौरैया भी थी. क्योंकि चीनी सरकार को लगता था कि मक्खी, मच्छर, चूहा और गौरैया से अनाज का बहुत नुकसान हो रहा है. अभियान के तहत लोगों ने लाखों गौरैया चिड़िया को मरने पर मजबूर कर दिया. कॉकेशियन ट्री स्पैरो जो चीन में हर जगह दिखती थी विलुप्त हो गई. अभियान के जरिए एक बड़ी कामयाबी तो हासिल की गई लेकिन जल्दी ही लोगों की समझ में आ गया कि इकोलॉजी यानी पारिस्थितिकी के संतुलन को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. इन्हीं दिनों चीन में खाद्यान्न संकट गहरा गया. फसलों को कीड़े और टिड्डे खा गए. चीनियों ने अकाल की कई वजह समझी जिसमें गौरैया सफाई अभियान को भी एक कारण माना गया. फिर माओ ने अप्रैल 1960 में गौरैया सफाई अभियान वापस लेने की घोषणा की.

यह भी समझा गया कि गौरैया अगर अनाज खाती थी तो फसलों के कीड़े मकोड़ों को भी साफ करती है. इसके बाद सोवियत संघ से ढाई लाख गौरैया की खेप मंगवाई गई ताकि नन्ही गौरैया टिड्डियों को बड़ा होने से पहले ही खाकर फसलों को बचाए.

भारत के अलावा विश्व में गौरैया की करीब 25 अलग-अलग प्रजातियां हैं. जो विश्व में अलग-अलग जलवायु के अनुसार अपनी आदतों में ढली हुई हैं. भारत में गौरैया को कई नाम से जाना जाता है. विश्व गौरैया दिवस का उद्देश्य गौरैया की घटती आबादी और उनके संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना है.

बढ़ते शहरीकरण और घरों के आसपास घोंसले बनाने की जगह पेड़ों की कटाई से इनके हैबिटेट पर असर पड़ा है. फसलों में रसायन और कीटनाशकों के प्रयोग से भी इनकी आबादी पर असर डाला है. गांव और शहरों में बनाए गए घर भी अब इस तरह बन रहे हैं कि वहां घोंसले बनाना मुश्किल हो गया है. गौरैया को प्राकृतिक संरक्षण की जरूरत है क्योंकि इसके हैबिटेट में कमी आयी है. फिर से गौरैया को अपने आसपास और घर आंगन में फुदकने को गौरैया बर्ड हाउस बना कर उनको संरक्षित करें. प्रजनन के समय गौरैया के अंडों को सुरक्षित रखने का ध्यान रखें. इको फ्रेंडली बर्ड होम बनाएं. क्योंकि गौरैया अगर जाती है तो अकेली नहीं जाती है बहुत कुछ साथ ले जाती है और अगर वह आएगी तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर आएगी.

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-भारत एक्सप्रेस



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