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जमनालाल बजाज पुण्यतिथि: गांधीजी के ‘पांचवें पुत्र’ ने कैसे जोड़ा उद्योग, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधार?

महान उद्योगपति जमनालाल बजाज ने व्यापार को गांधीवादी ट्रस्टीशिप से जोड़कर राष्ट्रसेवा का नया मॉडल दिया. अस्पृश्यता उन्मूलन, खादी और स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान आज भी प्रेरणा देता है.

Edited by Rohit Agrawal

Jamnalal Bajaj Death Anniversary: आज महान उद्योगपति और राष्ट्रसेवक जमनालाल बजाज की पुण्यतिथि है. वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने व्यापार, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधार को एक साथ जोड़कर एक अनुपम उदाहरण पेश किया. महात्मा गांधी ने उन्हें स्नेह से अपना ‘पांचवां पुत्र’ कहा था. उनका जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान के सीकर जिले के काशी-का-बास गांव में एक साधारण मारवाड़ी परिवार में हुआ था.

बचपन में ही सेठ बच्छराज बजाज ने उन्हें गोद लिया, जिससे कम उम्र में ही व्यापार और साहूकारी की दुनिया से जुड़ गए. लेकिन उनकी जिंदगी का असली मोड़ 1915-16 में आया जब वे महात्मा गांधी से मिले. गांधीजी की सादगी, अहिंसा, सत्याग्रह और खादी की विचारधारा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पारंपरिक व्यापारी विलासिता छोड़ दी. खादी पहनना, शाकाहार, संयम और न्यूनतम व्यय. ये सब उन्होंने गांधीवादी जीवनशैली के रूप में अपनाया.

1920 के दशक में उन्होंने बजाज समूह की नींव रखी, लेकिन गांधीजी के निकट आने के बाद अपने उद्योग को ट्रस्टीशिप (अमानतदारी) की गांधीवादी अवधारणा से जोड़ दिया. उनका मानना था कि मुनाफा निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि समाज की संपत्ति है. गांधीजी अक्सर अन्य पूंजीपतियों को समझाने के लिए जमनालाल का उदाहरण देते थे कि सच्चा उद्योगपति ईमानदार ट्रस्टी की तरह जी सकता है.

वहीं जमनालाल ने गांधीजी के लिए वर्धा में सेवाग्राम आश्रम की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने जमीन, धन और संसाधन उदारता से दिए, जिससे वर्धा गांधीजी के राजनीतिक और आध्यात्मिक कार्य का प्रमुख केंद्र बन गया. कांग्रेस में वे लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे और असहयोग आंदोलन, विदेशी वस्त्र बहिष्कार, नमक सत्याग्रह जैसे अभियानों के वित्तीय और लॉजिस्टिक प्रबंधन में अहम योगदान दिया. फिर भी उन्होंने कभी कोई ऊंचा राजनीतिक पद नहीं मांगा.

सामाजिक सुधार में अमूल्य योगदान

जमनालाल बजाज का सामाजिक सुधार में योगदान अविस्मरणीय है:

– अस्पृश्यता निवारण, मंदिर प्रवेश, अंतरजातीय विवाह, स्त्री शिक्षा और हिंदी प्रचार के प्रबल समर्थक रहे.
– 1928 में वर्धा के लक्ष्मीनारायण मंदिर के द्वार दलितों के लिए खोल दिए. उस समय यह बेहद साहसी कदम था.
– खादी, ग्रामोद्योग और गांव-केंद्रित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए चरखा आंदोलन, खादी बोर्ड, गांधी सेवा संघ और सस्ता साहित्य मंडल जैसे प्रयास किए.

यह भी बताते चलें कि व्यक्तिगत जीवन में गांधीजी का उनके साथ पारिवारिक संबंध था. गांधीजी अक्सर उनके वर्धा घर में ठहरते, परिवार के फैसलों में सलाह देते और उनकी पत्नी जानकीदेवी को स्वतंत्रता आंदोलन व महिला जागरण में सक्रिय होने के लिए प्रेरित करते थे.

आज भी जीवित है उनकी विरासत

आज भी  जमनालाल बजाज फाउंडेशन और जमनालाल बजाज पुरस्कार उनके नाम पर चलते हैं, जो ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय और गांधीवादी रचनात्मक कार्यों को सम्मानित करते हैं. जमनालाल बजाज का जीवन साबित करता है कि व्यापार और सेवा एक साथ चल सकते हैं. वे एक ऐसे उद्योगपति थे जिन्होंने लाभ से ज्यादा लोक कल्याण को चुना. उनकी सादगी, निस्वार्थ सेवा और राष्ट्रभक्ति आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

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-भारत एक्सप्रेस



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