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जंतर-मंतर से उठी आवाज और ‘आंदोलनजीवी’ की नई समझ, क्या शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत हो चुकी है?

जंतर-मंतर पर उठी छात्रों और युवाओं की आवाज सिर्फ एक पेपर लीक विवाद का विरोध नहीं है, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था में भरोसे और जवाबदेही को लेकर उठ रहे बड़े सवालों का संकेत है.

जंतर-मंतर पर हाल ही में दिखाई दिया छात्रों और युवाओं का गुस्सा सिर्फ एक परीक्षा पेपर लीक तक सीमित मामला नहीं है. यह उस बेचैनी की आवाज है, जो देश के लाखों विद्यार्थियों के मन में लंबे समय से जमा हो रही है. जब मेहनत, सपने और भविष्य दांव पर लगते हैं, तो सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठने लगता है.

इसी भावना के साथ ‘Cockroach Janta Party’ (CJP) के आह्वान पर बड़ी संख्या में छात्र, अभिभावक और युवा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे. हाथों में तख्तियां और जुबान पर नारे थे, ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ और ‘परीक्षा घोटाले बंद करो.’ प्रदर्शनकारियों का गुस्सा नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद, छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं, लगातार सामने आ रहे परीक्षा घोटालों और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की कमी को लेकर था.

ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री की पुस्तक ‘आंदोलनजीवी: किसान संघर्ष और आजाद भारत के जन आंदोलन’ चर्चा में आना स्वाभाविक है. यह किताब आजादी के बाद देश में हुए बड़े जन आंदोलनों की कहानी बताती है. इसमें किसान संघर्षों से लेकर अलग-अलग सामाजिक आंदोलनों तक का विस्तृत विवरण है और यह समझाने की कोशिश की गई है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज कितनी महत्वपूर्ण होती है.

‘आंदोलनजीवी’ शब्द को लेकर भी पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक बहस देखने को मिली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शब्द का इस्तेमाल आलोचनात्मक संदर्भ में किया था, लेकिन विनोद अग्निहोत्री अपनी पुस्तक में इसे एक अलग नजरिए से देखते हैं. उनके लिए आंदोलनजीवी वह व्यक्ति है, जो समाज की समस्याओं को सामने लाता है और लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव की मांग करता है.

चार दशक से ज्यादा समय तक किसान और जन आंदोलनों की रिपोर्टिंग करने वाले अग्निहोत्री बताते हैं कि जनता के संघर्ष अक्सर केवल विरोध तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे नीतियों और व्यवस्थाओं में सुधार का रास्ता भी बनाते हैं.

शिक्षा व्यवस्था पर बढ़ता सवाल

जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन भी इसी लंबे संघर्ष की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. पेपर लीक, परीक्षा में पारदर्शिता की कमी, छात्रों का मानसिक दबाव और रोजगार को लेकर चिंता — ये सभी मुद्दे आज शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं.

जिस तरह किसान आंदोलन ने कृषि नीतियों और सरकार के फैसलों पर सवाल खड़े किए थे, उसी तरह छात्र आंदोलन अब परीक्षा प्रणाली और शिक्षा के ढांचे में सुधार की मांग कर रहा है.

‘आंदोलनजीवी’ पढ़ने वाले युवाओं को यह समझ आता है कि उनका संघर्ष अकेला नहीं है. भारत में आम लोगों ने अलग-अलग दौर में अपने अधिकारों, समान अवसरों और बेहतर व्यवस्था के लिए आवाज उठाई है. कई बार इन्हीं आंदोलनों ने भविष्य की नीतियों को दिशा दी है.

भारत में शिक्षा सुधार की लंबी यात्रा

भारत में शिक्षा को लेकर बदलाव की मांग कोई नई बात नहीं है. इसकी शुरुआत औपनिवेशिक दौर से ही हो गई थी. अंग्रेजों के समय शिक्षा व्यवस्था सीमित वर्ग तक केंद्रित थी. 1835 के मैकाले मिनट के बाद अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा मिला, जिसका उद्देश्य मुख्य रूप से प्रशासनिक कामों के लिए कर्मचारी तैयार करना था.

इसके जवाब में कई सामाजिक और शैक्षणिक आंदोलन खड़े हुए. राजा राममोहन राय के नेतृत्व वाले ब्राह्मो समाज ने आधुनिक शिक्षा, महिलाओं की शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया. स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज ने DAV संस्थानों के जरिए पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा के मेल की कोशिश की. सर सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन ने मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा को आगे बढ़ाया.

1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा की मांग तेज हुई. रवींद्रनाथ टैगोर और अरविंद घोष जैसे लोगों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी दौर में शांतिनिकेतन और गुरुकुल कांगड़ी जैसी संस्थाओं का विकास हुआ.

बाद में गोपाल कृष्ण गोखले ने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त बनाने की पहल की. महात्मा गांधी की ‘नई तालीम’ योजना ने शिक्षा को जीवन, काम और स्थानीय जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया.

आजादी के बाद शिक्षा सुधार और नई चुनौतियां

स्वतंत्र भारत में शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए कई आयोग बनाए गए. राधाकृष्णन आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा पर ध्यान दिया, जबकि कोठारी आयोग ने देश के लिए एक व्यापक शिक्षा प्रणाली की नींव रखने का काम किया.

1968 और 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों ने समानता, विज्ञान और व्यावसायिक शिक्षा को महत्व दिया. 2009 का शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में बड़ा कदम था.

हालांकि, नई शिक्षा नीति 2020 में बहु-विषयक शिक्षा, मातृभाषा में पढ़ाई और डिजिटल शिक्षा जैसे लक्ष्यों पर जोर दिया गया है, लेकिन इसके लागू होने के तरीके, निजीकरण और शिक्षा के केंद्रीकरण को लेकर बहस जारी है.

युवाओं की मांग और भविष्य का सवाल

आज का छात्र आंदोलन कई गंभीर सवाल सामने रख रहा है. परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे बढ़े? पेपर लीक जैसी घटनाएं कैसे रुकें? छात्रों का भरोसा दोबारा कैसे कायम हो? कोचिंग संस्कृति और बढ़ते मानसिक दबाव का समाधान क्या हो?

प्रदर्शन कर रहे छात्रों की प्रमुख मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रभावित विद्यार्थियों के लिए न्याय, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव शामिल हैं.

जंतर-मंतर पर उठी यह आवाज सिर्फ वर्तमान की नाराजगी नहीं है. यह उस लंबे इतिहास का हिस्सा है, जिसमें भारत के लोगों ने शिक्षा, अधिकार और बेहतर भविष्य के लिए लगातार संघर्ष किया है. ‘आंदोलनजीवी’ इसी बात की याद दिलाती है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना और सुधार की मांग करना व्यवस्था को मजबूत करने का एक जरूरी हिस्सा है.

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-भारत एक्सप्रेस



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