World Desertification Day: नई किताब ‘पीपल की छांव में’ खोलेगी बंजर धरती को दोबारा हरा-भरा बनाने और सूखा संकट से निपटने का अचूक मंत्र
World Desertification Day: विश्व मरुस्थलीकरण दिवस पर प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पीपल बाबा की नई किताब 'पीपल की छांव में' लॉन्च हुई है. ढाई करोड़ से अधिक पेड़ लगा चुके पीपल बाबा की यह किताब बंजर धरती को हरा-भरा बनाने और सूखा संकट से निपटने का एक बड़ा संदेश देती है.
सिर्फ फिल्म नहीं, विभाजन का असली दर्द हैं ये 5 उपन्यास; ‘झूठा सच’ से ‘तमस’ तक, जो आंखें नम कर देंगी
इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ ने एक बार फिर 1947 के विभाजन के उस दर्द को ताजा कर दिया है, जिसे लाखों लोगों ने अपनी जिंदगी में झेला था.
1991 के उस ‘साइलेंट सेवियर’ की कहानी, जिसने पर्दे के पीछे रहकर देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया
साल 1991 का आर्थिक संकट भारत के इतिहास का वह मोड़ था, जब देश का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र दो हफ्ते के आयात जितना बचा था. दिवालिया होने से बचने के लिए भारत को बैंक ऑफ इंग्लैंड और स्विस बैंक में 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था.
12 जून 1975: भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा दिन, जिसने पूरे देश की बदल दी दिशा
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसले में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को रद्द कर दिया था. राज नारायण की याचिका पर आए इस फैसले में इंदिरा पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप सही पाया गया और उन पर 6 साल का प्रतिबंध लगा दिया गया.
कलम की ताकत ने बंदूकों को किया शांत, गया के ‘मगध सुपर 30’ ने कैसे बदली नक्सल प्रभावित इलाके की तकदीर
खान सर और कोचिंग संस्थाओं को लेकर जारी बहस के बीच, बिहार कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी अभयानंद की आत्मकथा 'असीम' का यह अंश 'सुपर-30' की शुरुआत की एक अलग कहानी सामने लाता है. इसमें अभयानंद बताते हैं कि किस तरह आनंद कुमार के साथ मिलकर उन्होंने आर्थिक रूप से वंचित लेकिन मेधावी छात्रों के लिए इस पहल की नींव रखी थी. आज जब कोचिंग संस्थानों की भूमिका और उनके सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठ रहे हैं, तब 'सुपर-30' की इस शुरुआती यात्रा को उसके सह-संस्थापक की नज़र से पढ़ना दिलचस्प भी है और प्रासंगिक भी.
संडे का फंडा: सिर्फ आराम का दिन नहीं, बल्कि शोषित मजदूरों की जीत का प्रतीक है रविवार, जानें कैसे बना छुट्टी का दिन
मजदूर नेता नारायण मेघाजी लोखंडे के 7 साल के कड़े आंदोलन के बाद, आखिरकार 10 जून 1890 के प्रस्ताव को मानते हुए अंग्रेजी हुकूमत को झुकना पड़ा और रविवार को आधिकारिक तौर पर देश का पहला साप्ताहिक अवकाश घोषित किया गया.
स्थानीय हवा नहीं, ग्लोबल सिस्टम का हिस्सा है भारतीय मॉनसून; जानें सर गिल्बर्ट वॉकर की ऐतिहासिक खोज की पूरी कहानी
1920 के दशक में आईएमडी के प्रमुख सर गिल्बर्ट वॉकर द्वारा की गई 'दक्षिणी आक्सिलेशन' (Southern Oscillation) की खोज ने भारतीय मॉनसून के पूर्वानुमान को हमेशा के लिए बदल दिया. इस खोज ने साबित किया कि मॉनसून कोई स्थानीय घटना नहीं बल्कि एक वैश्विक प्रणाली है.
विदेशी धरती से आजादी की अलख जगाने वाले महानायक; क्या मिटाई जा रही है मौलाना बरकतुल्ला की पहचान?
भोपाल स्थित मौलाना बरकतुल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने के प्रस्ताव ने एक बार फिर बहस को तेज कर दिया है.
मंच नहीं, जंगल चुना! अरावली की छांव में पौधे लगाते हुए लॉन्च हुई ‘पीपल बाबा’ की नई किताब
गुरुग्राम के अरावली जंगल में पेड़ों के बीच जब स्वामी प्रेम परिवर्तन की किताब ‘पीपल की छाँव में’ का लोकार्पण किया गया, तो यह सिर्फ एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि प्रकृति के साथ एक भावनात्मक संवाद जैसा महसूस हुआ.
बदलाव की चाह, आज़ादी की मांग और फिर… बिछ गईं हज़ारों लाशें; बीजिंग की उस रात का वो सच जिसे आज भी छिपाता है चीन
4 जून 1989 की रात बीजिंग के थियानमेन चौक पर जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को हिला दिया था. यह वही जगह थी जहां हजारों छात्र और आम नागरिक शांतिपूर्वक इकट्ठा होकर अपने देश में लोकतंत्र, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग कर रहे थे.







