शिक्षक दिवस पर जानिए क्यों आज भी प्रासंगिक है 'भारतीय शिक्षा सेवा' (IES) का गठन. (AI IMAGE)
Indian Education Service: शिक्षक दिवस पर देश भर में शिक्षकों का सम्मान होता है. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर हम उनके विचारों को याद करते हैं, पर इस दिन सिर्फ फूल और भाषणों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं. आज का सबसे जरूरी सवाल यह है कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए संस्थागत सुधार क्यों नहीं हुए.
हाल के वर्षों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय अगर भारतीय सिविल सेवा (IAS) की तर्ज पर भारतीय शिक्षा सेवा (Indian Education Service- IES) का गठन हो जाता, तो आज की शिक्षा व्यवस्था कहीं अधिक व्यवस्थित, पेशेवर और गुणवत्तापूर्ण होती.
इतिहास में क्या था?
ब्रिटिश काल में 1896 में Indian Educational Service का गठन हुआ था. यह अखिल भारतीय सेवा थी, जो शिक्षा विभागों के उच्च पदों पर नियुक्ति करती थी. 1920 के दशक में प्रांतीय स्वायत्तता के कारण यह सेवा समाप्त हो गई और शिक्षा मुख्य रूप से प्रांतीय विषय बन गई.
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार ने प्रशासनिक सेवाओं को मजबूत किया. IAS, IPS और बाद में Indian Economic Service (1961) जैसी विशेषज्ञ सेवाओं का गठन हुआ. शिक्षा के क्षेत्र में भी इसी मॉडल की जरूरत महसूस की गई.
1964-66 के ‘कोठारी आयोग’ ने साफ सिफारिश की थी कि IAS की तर्ज पर एक All-India Education Service बनाई जाए. इसका उद्देश्य शिक्षा प्रशासन में राष्ट्रीय दृष्टिकोण, पेशेवर नेतृत्व और राज्यों में एकसमान मानकों को लाना था. 1968 और 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में भी इस सिफारिश को दोहराया गया पर यह सेवा कभी नहीं बनी.
अगर बन जाती तो क्या बदलता?
आज शिक्षा मुख्य रूप से राज्य सूची का विषय है (समवर्ती सूची में होने के बावजूद). नतीजा यह है कि गुणवत्ता, शिक्षक भर्ती, प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम और प्रशासन में भारी असमानता है. कुछ राज्यों में बेहतर व्यवस्था है, कई राज्यों में शिक्षक भर्ती राजनीतिक हस्तक्षेप, देरी और अनियमितताओं से ग्रस्त रहती है.
भारतीय शिक्षा सेवा अगर नेहरू काल में गठित हो जाती तो:
- शिक्षा प्रशासन में एक पेशेवर अखिल भारतीय कैडर होता. उच्च पदों पर (जिला शिक्षा अधिकारी से लेकर राज्य शिक्षा सचिव और केंद्रीय स्तर तक) चयनित, प्रशिक्षित और स्थायी अधिकारी होते.
- शिक्षक भर्ती, पदोन्नति और स्थानांतरण में अधिक पारदर्शिता और मेरिट आधारित व्यवस्था आती.
- राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों का जमीनी क्रियान्वयन बेहतर होता. नीतियां सिर्फ दस्तावेज न रहकर वास्तविक बदलाव ला पातीं.
- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों और प्रशासकों की उपलब्धता बढ़ती.
- शिक्षा को राजनीति से कुछ हद तक अलग रखा जा सकता था.
- नेहरू जी ने उच्च शिक्षा में IITs, AIIMS, UGC जैसी संस्थाओं की नींव रखी. वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा को प्राथमिकता दी. लेकिन स्कूली शिक्षा के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने का अवसर छूट गया. कोठारी आयोग की सिफारिशें नेहरू के बाद आईं, पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण सेवा नहीं बनी.
आज की प्रासंगिकता
शिक्षक दिवस पर हम शिक्षकों की भूमिका को याद करते हैं, पर शिक्षक अकेले व्यवस्था नहीं बदल सकते. अच्छी व्यवस्था ही अच्छे शिक्षकों को आकर्षित करती है, उन्हें प्रेरित रखती है और बच्चों तक गुणवत्ता पहुंचाती है.
आज भी कई विशेषज्ञ, शिक्षाविद और पूर्व अधिकारी भारतीय शिक्षा सेवा की मांग दोहराते हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा प्रबंधन सुधारों पर जोर दिया गया है, पर अखिल भारतीय सेवा का स्पष्ट प्रावधान नहीं है. हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने भी इसे लागू करने से परहेज किया है.
शिक्षा राष्ट्र निर्माण का आधार है. जिस तरह IAS ने प्रशासन को एक मजबूत ढांचा दिया, उसी तरह शिक्षा सेवा शिक्षा को एक मजबूत पेशेवर आधार दे सकती थी. यह काल्पनिक ‘अगर’ सिर्फ अफसोस नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी बताता है.
इस शिक्षक दिवस पर सिर्फ शिक्षकों का सम्मान ही नहीं, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी जतानी चाहिए. भारतीय शिक्षा सेवा जैसी संस्थागत व्यवस्था का पुनरुत्थान आज भी प्रासंगिक है. क्योंकि शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण हैं, पर उन्हें काम करने के लिए सही व्यवस्था भी चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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