दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि देश भर में कई राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट देने वाले छात्रों के रास्ते में भाषा की बाधा नहीं होनी चाहिए. मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा आयोजित करने में व्यवहारिक कठिनाइयां हो सकती है. लेकिन एनएलयू संघ इस मुद्दे पर आठ सप्ताह के भीतर ठोस निर्णय ले और सुनिश्चित करे कि भाषा की बाधाओं के कारण कोई भी छात्र सीएलएटी की आयोजित परीक्षा से बाहर न रहे.
कोर्ट 20 अगस्त को करेगी अगली सुनवाई
कोर्ट 20 अगस्त को इस मामले में अगली सुनवाई करेगें. वर्तमान में सीएलएटी केवल अंग्रेजी में आयोजित नकया जाता है और गैर-अंग्रेजी माध्यम वाले छात्रों को अक्सर परीक्षा पास करने में कठिनाई होती है. कोर्ट ने कहा कि सलाहकार बोर्ड ने इस मामले में कुछ सिफारिशें की है. मामला अभी भी विचाराधीन है और अंतिम निर्णय पर पहुचनें के लिए और समय मांगा गया है. हम आठ सप्ताह का समय देते हैं. साथ ही हम दोहराते है कि निर्णय लेते समय संघ को हमारे पिछले आदेश में की गई टिप्पणियों से भी मार्गदर्शन लेना चाहिए.
छात्रों के हित में बोला दिल्ली हाई कोर्ट
हम उम्मीद करते हैं और इस मामले में कोई ठोस निर्णय किया जाएगा, जिससे एनएलयू में नामांकन चाहने वालों को किसी भी भाषा की बाधा के कारण कोई छूट न मिले. कोर्ट ने यह टिप्पणी एनएलयू के संघ को क्षेत्रीय भाषाओं में सीएलएटी आयोजित करने के निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की. उसने कहा कि इस मुद्दे पर अदालत किस हद तक हस्तक्षेप कर सकता है.
समाज में धीरे-धीरे हो रहा बदलाव
अदालत ऐसे मामलों पर बहस करने के लिए उपयुक्त मंच नहीं हो सकता है. समाज में धीरे-धीरे बहुत सी चीजें हो रही है. 10 साल पहले आईआईटी परीक्षा स्थानीय भाषा में नहीं होती थी, अब होती है. आखिरकार यह नीतिगत फैसला है. प्रत्येक एनएलयू उस अधिनियम के तहत संचालित होता है, जिसके तहत उसका गठत किया गया है. कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि परीक्षा स्थानीय भाषाओं में भी होनी चाहिए, लेकिन मुद्दा यह है कि इसे कैसे लागू किया जाए. केन्डे सरकार ने भी सभी भाषाओं में परीक्षा आयोजित होने की बात कही.
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