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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने मिलान में सामाजिक-आर्थिक न्याय को आगे बढ़ाने में भारतीय संविधान की भूमिका पर दिया संबोधन

चीफ जस्टिस गवई ने न्याय और समानता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाया न्यायमूर्ति गवई ने भारत की अनूठी संवैधानिक यात्रा, विशेष रूप से गरीबी, असमानता और औपनिवेशिक विरासत के संदर्भ में, पर विचार करके अपनी स्पीच शुरू की

मिलान में एक ऐतिहासिक संबोधन में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई ने पिछले 75 वर्षों में सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देने में भारतीय संविधान की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित किया. चैंबर ऑफ इंटरनेशनल लॉयर्स के निमंत्रण पर बोलते हुए चीफ जस्टिस गवई ने यूरोपीय न्यायाधीशों, कानूनी पेशेवरों और शिक्षाविदों के एक सम्मानित श्रोता को संबोधित किया.

चीफ जस्टिस गवई ने न्याय और समानता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाया न्यायमूर्ति गवई ने भारत की अनूठी संवैधानिक यात्रा, विशेष रूप से गरीबी, असमानता और औपनिवेशिक विरासत के संदर्भ में, पर विचार करके अपनी स्पीच शुरू की. उन्होंने जॉन रॉल्स और अमर्त्य सेन जैसे प्रभावशाली विचारकों का हवाला देते हुए कहा कि न्याय को कम से कम सुविधा प्राप्त लोगों के लिए वास्तविक अवसरों में बदलना चाहिए.

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक-आर्थिक न्याय न केवल कल्याण के लिए बल्कि समाज में सम्मान, स्वायत्तता और समान भागीदारी को सक्षम करने के लिए आवश्यक है. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ बीआर अंबेडकर के योगदान पर प्रकाश डालते हुए न्यायमूर्ति गवई ने दोहराया कि भारत के संस्थापक नेताओं ने एक ऐसे संविधान की कल्पना की थी जो राजनीतिक स्वतंत्रता से परे जाकर आर्थिक और सामाजिक उत्थान सुनिश्चित करेगा.

चीफ जस्टिस ने अंबेडकर के लेखन का हवाला दिया जिसमें नागरिक स्वतंत्रता की सच्ची प्राप्ति के लिए संरचनात्मक असमानताओं को संबोधित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया था. न्यायमूर्ति गवई ने बताया कि संविधान के राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और हाशिए पर पड़े समुदायों के संरक्षण जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता को कैसे दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि हालांकि ये सिद्धांत अदालतों द्वारा लागू नहीं किए जा सकते हैं, लेकिन वे नीति निर्माण का मार्गदर्शन करते हैं और राज्य को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह बनाते हैं.

न्यायिक और विधायी विकास

न्यायपालिका द्वारा जाति-आधारित कोटा और भूमि सुधार जैसी नीतियों के शुरुआती प्रतिरोध सहित शुरुआती असफलताओं को स्वीकार करते हुए, न्यायमूर्ति गवई ने याद दिलाया कि कैसे संसद ने 1951 में पहले संवैधानिक संशोधन के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की. इस संशोधन ने प्रगतिशील कानूनों को न्यायिक अमान्यता से बचाने के लिए नौवीं अनुसूची पेश की.

अपने संबोधन का समापन करते हुए न्यायमूर्ति गवई ने इस बात पर जोर दिया कि सर आइवर जेनिंग्स जैसे संवैधानिक विद्वानों के शुरुआती संदेह के बावजूद, भारतीय संविधान एक लचीला और विकसित ढांचा साबित हुआ है. उन्होंने इसे समावेशी शासन के लिए एक प्रकाश स्तंभ और कानून के माध्यम से न्याय प्राप्त करने का प्रयास करने वाले अन्य लोकतंत्रों के लिए एक मॉडल बताया.


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-भारत एक्सप्रेस



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