सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के संदर्भ में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों को लेकर चल रही सुनवाई 3 सितंबर को भी जारी रहेगी. तमिलनाडु सरकार की ओर से बहस पूरी हो गई है. वही पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का 3 सितंबर को भी जिरह जारी रहेगा. सीजेआई बी आर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधेयकों की मंजूरी में देरी के उदाहरण राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए निश्चित समयसीमा लागू करने को उचित नही ठहरा सकते.
व्यक्तिगत मामलों में नहीं होगी संविधान की व्याख्या- कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि संविधान के प्रावधानों की व्याख्या केवल प्रेसीडेंशियल रेफरेंस में की जाएगी, व्यक्तिगत मामलों में नहीं. कोर्ट ने कहा कि वह संविधान की व्याख्या केवल राष्ट्रपति के संदर्भ में ही करेगा. जिसमें यह पूछा गया था कि क्या न्यायालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकता है. मामले की सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार की दलील का विरोध किया है. तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा अगर राज्यपाल विधेयक को रोक लेते हैं, तो विधेयक ठहर जाता है.
अगर राज्यपाल बिल रोक लें तो प्रक्रिया ठहर जाती है- सिंघवी
सीजेआई ने साफ किया कि प्रेसीडेंशियल रेफरेंस सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपालों और राष्ट्रपति के विवेकाधिकर और समय-सीमा निर्धारण से संबंधित कानून के प्रश्न पर केंद्रित है. सीजेआई ने आगे कहा कि हम अलग-अलग राज्यों में हो रही किसी भी घटना पर विचार नहीं कर रहे हैं. सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा कि मेरे पास तमिलनाडु और केरल का एक चार्ट है. इस स्तर पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुण-दोष के आधार पर प्रस्तुतिकरण का विरोध किया और कहा कि उनके पास अन्य राज्यों के चार्ट है. उन्होंने कहा कि अगर वह गंदा रास्ता अपनाना चाहते हैं, तो मुझे कोई दिक्कत नही है. मैं उस रास्ते पर भी चलने को तैयार हूं, लेकिन यह जरूरी नहीं है. यह राष्ट्रपति का रेफरेंस है.
इसके जवाब में सिंघवी ने कहा मेहता धमकियां काम नहीं आती. सीजेआई ने सिंघवी से पूछा क्या हम अनुच्छेद 142 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों के उपयोग के लिए एक निश्चित दिशानिर्देश तय कर सकते है? सिंघवी ने जवाब दिया कि अगर कोई कानून अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, तो कोर्ट को अनुच्छेद 200 पर समयसीमा तय करने से पहले पुनर्विचार करने पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि संविधान के किसी अन्य अनुच्छेद में यह निहित है कि अनुच्छेद 200 पर समयसीमा नही लगाई जानी चाहिए, तो क्या अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करेगा? यह एक और सीमा पैदा करने का सवाल है.
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-भारत एक्सप्रेस
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