राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर, जेंडर आधारित हिंसा की रोकथाम के लिए किशोरियों के साथ काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था मुक्कामार ने ‘ZIDD: Voices of Resistance’ पुस्तक का विशेष प्री-लॉन्च किया. इसके साथ ही बालिकाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा का आयोजन वाईएमसीए ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में किया गया.
इस कार्यक्रम में दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और नागरिक समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए. पैनल में अजय चौधरी (आईपीएस), स्पेशल कमिश्नर, SPUWAC, दिल्ली पुलिस; डॉ. रश्मि सिंह (आईएएस), सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग, दिल्ली सरकार; अतिया बोस, संस्थापक सदस्य व लीड, आंगन ट्रस्ट और इशिता शर्मा, संस्थापक एवं सीईओ, मुक्कामार शामिल रहीं. सत्र का संचालन रवि वर्मा, कार्यकारी निदेशक, आईसीआरडब्ल्यू एशिया ने किया.
लड़कियों के वास्तविक अनुभव नजरअंदाज
ऐसे समय में जब महिलाओं की सुरक्षा पर होने वाली चर्चाओं में अक्सर लड़कियों के वास्तविक अनुभवों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, ‘ZIDD: Voices of Resistance’ किशोरियों की आवाज को केंद्र में लाती है. यह पुस्तक वास्तविक घटनाओं से प्रेरित कहानियों के माध्यम से प्रतिरोध, सवाल उठाने और हिंसा के खिलाफ रोजमर्रा के साहसिक कदमों को सामने रखती है.

पैनल चर्चा का केंद्रीय सवाल था क्या हम, व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर, उन लड़कियों के लिए तैयार हैं जो बोलने का साहस करती हैं? इस चर्चा में कानून व्यवस्था, सरकार और बाल अधिकार क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ लोगों ने भाग लिया.
हिंसा की परिभाषा को नए सिरे से समझना होगा
कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. रश्मि सिंह (आईएएस) ने आत्मरक्षा की मुक्कामार की बदली हुई परिभाषा पर जोर देते हुए कहा,
“हमें हिंसा की परिभाषा को नए सिरे से समझना होगा. हिंसा सिर्फ शारीरिक नहीं होती, मानसिक और भावनात्मक हिंसा भी उतनी ही वास्तविक और नुकसानदेह होती है.”
पर्याप्त बदलाव होना चाहिये
स्पेशल कमिश्नर अजय चौधरी (आईपीएस) ने कानूनी सुधारों के बावजूद हिंसा के बने रहने पर चिंता जताई. उन्होंने कहा,
“पिछले 15 सालों में मैंने ऐसी हजारों कहानियां सुनी हैं. दशकों बाद भी पर्याप्त बदलाव नहीं दिखता. बदलाव सामूहिक चेतना से ही आएगा. निर्भया के बाद युवाओं के विरोध से फास्ट ट्रैक कोर्ट और कानून में बदलाव हुए. अगर आप सवाल नहीं उठाएंगे, तो आपकी आवाज नहीं सुनी जाएगी. बोलना पड़ेगा.”
आंगन ट्रस्ट की अतिया बोस ने समाज के नजरिए पर सवाल उठाते हुए कहा, “हम सुरक्षा को सार्वजनिक ज़िम्मेदारी नहीं, निजी समस्या मानते हैं. सुरक्षा बुनियादी अधिकार है और इसके लिए बुनियादी ढांचे की मांग उतनी ही जरूरी है.”
हिंसा को लेकर सामाजिक सोच पर बात करते हुए इशिता शर्मा, अभिनेता और मुक्कामार की संस्थापक एवं सीईओ, ने कहा,
“हमारी हिंसा के प्रति सहनशीलता बहुत ज्यादा है. अक्सर हम सिर्फ गंभीर शारीरिक हमले को ही पहचानते हैं, जबकि लड़कियों को हर तरह की हिंसा के खिलाफ बोलने के लिए समर्थन चाहिए.”
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कार्यक्रम के समापन में पूणम मुत्तरेजा, कार्यकारी निदेशक, पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने सामाजिक मानदंडों में बदलाव और सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने दिल्ली में बालिकाओं की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सभी हितधारकों से मिलकर काम करने की अपील की.
किताब की कहानियों पर रोशनी डालते हुए, इशिता शर्मा ने उन लड़कियों की हिम्मत पर जोर दिया जो रोजाना होने वाली हिंसा का विरोध करती हैं. “लड़कियां बहुत जल्दी सीख जाती हैं कि उनके पास सिर्फ दो ऑप्शन हैं: ‘अच्छी’ बनें या सुरक्षित रहें. इस किताब की लड़कियां उस ऑप्शन को मना कर देती हैं; वे हिंसा को नॉर्मल मानकर चुपचाप सहने से मना कर देती हैं.”
-भारत एक्सप्रेस
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