CJI को 'इस्तीफा दो' कहना केरल कांग्रेस को पड़ा भारी
Kerala Congress CJI Controversy: मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात की मांग ठुकराए जाने के बाद सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट अब केरल कांग्रेस के लिए कानूनी चुनौती बन गई है. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को ‘अभी इस्तीफा दो’ कहने वाली इस पोस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने अटॉर्नी जनरल से आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मंजूरी मांगी है. पोस्ट में यह भी कहा गया था कि अगर CJI कानून-व्यवस्था नहीं संभाल सकते, तो उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को लाया जाएगा.
मामला केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के आधिकारिक एक्स अकाउंट से 12 अक्टूबर को किए गए पोस्ट से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सविता सिंह ने 16 अक्टूबर को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को आवेदन देकर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सनी जोसेफ और सोशल मीडिया अकाउंट के प्रशासकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की अनुमति मांगी है.
क्या लिखा था उस पोस्ट में?
कांग्रेस केरल के सत्यापित एक्स अकाउंट से किए गए पोस्ट में CJI सूर्यकांत को संबोधित करते हुए लिखा गया था,
“प्रिय सूर्यकांत, अगर कानून-व्यवस्था आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तो अभी इस्तीफा दे दीजिए. हम आपकी जगह ऐसे व्यक्ति को ढूंढ लेंगे, जो इसे संभाल सके.”

इस पोस्ट के सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया. अब अधिवक्ता सविता सिंह ने अटॉर्नी जनरल से मांग की है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए लिखित सहमति दी जाए.
अपने आवेदन में उन्होंने दावा किया कि पोस्ट की भाषा मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा को प्रभावित करने वाली थी. उनके मुताबिक, इस तरह की टिप्पणी से न्यायपालिका के प्रति लोगों के भरोसे पर असर पड़ सकता है.
राहुल गांधी और खरगे ने मांगा था CJI से मिलने का समय
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष के विरोध से जुड़ी है.
उस समय विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे. इसी सिलसिले में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने CJI सूर्यकांत को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था. दोनों नेता उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे.
हालांकि, CJI ने मुलाकात की मांग स्वीकार नहीं की. उन्होंने कहा कि संबंधित मुद्दे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं. ऐसे मामलों पर चर्चा के लिए मुलाकात करना शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत और न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं होगा.
इसी घटनाक्रम के बीच PTI की एक खबर में CJI की टिप्पणियों का जिक्र आया. इसके बाद कांग्रेस केरल के एक्स अकाउंट से वह पोस्ट किया गया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश से इस्तीफा देने को कहा गया था.
पोस्ट हटाया, पार्टी ने क्या सफाई दी?
पोस्ट पर आलोचना होने के बाद उसे एक्स से हटा दिया गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, KPCC अध्यक्ष सनी जोसेफ ने कहा था कि यह पोस्ट राज्य में पार्टी नेतृत्व की जानकारी, सहमति या सलाह के बिना किया गया था.
उन्होंने यह भी कहा था कि पोस्ट के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को उसके पद से हटा दिया गया है. पार्टी इस बात की जांच करेगी कि आखिर किन परिस्थितियों में यह पोस्ट प्रकाशित किया गया.
इस मामले में 17 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव मीनश दुबे ने भी सनी जोसेफ को कानूनी नोटिस भेजा था. नोटिस में पोस्ट को लेकर सार्वजनिक माफी नहीं मांगने और उसकी स्पष्ट निंदा नहीं करने पर जवाब मांगा गया था.
आवेदन में क्या है?
सविता सिंह ने अपने आवेदन में अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)(i) का हवाला दिया है. इस प्रावधान के तहत ऐसी सामग्री आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकती है, जो किसी अदालत के अधिकार को कम करती हो या उसकी छवि को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति रखती हो.
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 129 का भी उल्लेख किया है. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट को अपनी अवमानना के मामलों में कार्रवाई करने का अधिकार है.
आवेदन में यह दलील भी दी गई है कि किसी राजनीतिक संगठन की ओर से मौजूदा CJI को पद छोड़ने और उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को लाने की बात कहना न्यायिक स्वतंत्रता पर दबाव डालने वाला कदम माना जा सकता है. यह आवेदक की कानूनी दलील है, न कि इस मामले में अदालत की ओर से दिया गया कोई निष्कर्ष.
संविधान में न्यायाधीश को हटाने की क्या प्रक्रिया है?
आवेदन में संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 का भी जिक्र किया गया है. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया संविधान में तय है.
अनुच्छेद 124(4) के तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है. इसके लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है. इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं.
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सविता सिंह ने इसी संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए दलील दी है कि किसी न्यायाधीश को बदलने की सार्वजनिक मांग के जरिए तय प्रक्रिया को दरकिनार करने का प्रयास नहीं होना चाहिए. फिलहाल इस मामले में अटॉर्नी जनरल से लिखित सहमति मांगी गई है. आगे की कानूनी कार्यवाही इस सहमति और संबंधित प्रक्रिया पर निर्भर करेगी.
-भारत एक्सप्रेस
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