उत्तर प्रदेश की 2027 की विधानसभा लड़ाई अब केवल सत्ता बचाने की नहीं, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक चरित्र और नेतृत्व की परीक्षा की जंग बन चुकी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मैदान में पूरी तरह उतर चुके हैं—रोज दो बड़े कार्यक्रम, जिलों का दौरा, विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और विधायकों, संभावित प्रत्याशियों व स्थानीय प्रभावशाली चेहरों से लगातार संपर्क.
लेकिन सवाल यह है कि इस अभियान में पार्टी संगठन कहां है? योगी के ट्वीट और सरकारी उपलब्धियों को प्रदेश भाजपा बार-बार नजरअंदाज करती दिख रही है, जबकि चुनाव एक नेता की नहीं, पूरे संगठन की जंग होता है.
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष छिपा नहीं है. उन्हें बड़े संगठनात्मक अनुभव और तेज फैसलों की क्षमता के लिहाज से सवालों का सामना करना पड़ रहा है. जबकि उनके स्वास्थ्य को लेकर भी चर्चा पार्टी के अंदरूनी गलियारों में चल रही है. यह महज व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है; यह इस चिंता का संकेत है कि जिस प्रदेश में 403 सीटों की जंग है, वहां कमान संभालने वाले चेहरे की ऊर्जा और अधिकार कितने कारगर हैं.
महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह की भूमिका भी उतनी ही विवादित है. संगठन महामंत्री का काम कार्यकर्ताओं को जोड़ना, विवादों को सुलझाना और बूथ स्तर तक तंत्र को चुनावी रफ्तार देना है. पर यूपी भाजपा में कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि निर्णय देर से होते हैं, जिम्मेदारियां अस्पष्ट रहती हैं और जमीनी कार्यकर्ता को न राहत मिलती है, न दिशा. जिला प्रभारियों की लिस्ट जारी हुई जरूर, पर लिस्ट बनाना और मैदान में परिणाम दिलाना दो अलग बातें हैं.
प्रदेश कार्यसमिति के गठन ने इस असंतोष को और गहरा दिया है. कई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इसमें योग्यता और जमीनी प्रतिबद्धता से ज्यादा संतुष्टि, तावड़े और समझौतों का फॉर्मूला काम कर रहा है. जब संगठन में ऐसे चेहरे आ जाएं जो बूथ की भाषा नहीं जानते, तो चुनाव में वही चेहरे भार बनते हैं.
मीडिया टीम की स्थिति इससे भी चिंताजनक है. ऐसे प्रवक्ता सुर्खियों में हैं, जिन्हें बिना कागज देखे एक लाइन बोलने के अलावा कोई खास योग्यता नहीं दिखती. चुनावी माहौल में प्रवक्ता पार्टी का चेहरा होता है; उसकी गलती पूरे संगठन की कीमत पर वसूली जाती है. योगी सरकार के कामों को तर्क और तथ्य के साथ जनता तक पहुंचाने की बजाय खोखली बयानबाजी से मुद्दा फिसल रहा है. केंद्रीय नेतृत्व की चिंता भी यही है कि भाजपा के जिला पदाधिकारी और विधायक सपा के हमलों का जवाब देने में उतने सक्रिय नहीं हैं, जितने सपा कार्यकर्ता अखिलेश के संदेश फैलाने में हैं.
योगी आदित्यनाथ अप्रैल से जून के बीच दो दर्जन से अधिक जिलों में हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण-शिलान्यास कर चुके हैं और उनका जिला दौरा लगातार जारी है. वे हर विधानसभा के प्रमुख चेहरों विधायकों, संभावित प्रत्याशियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर चुनावी तानाबाना तैयार कर रहे हैं. लेकिन यही सबसे बड़ी चेतावनी भी है: जब मुख्यमंत्री को हर मोर्चे पर अकेले खड़ा होना पड़े, तो संगठन की उपस्थिति पर सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो जाता है.
प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री जिलों का दौरा कर रहे हैं, यह सच है. पर कार्यकर्ताओं को यही बात समझ नहीं आ रही कि दौरों के बाद जमीन पर क्या बदला? बूथ समितियां कितनी सक्रिय हुईं? विरोधी मुद्दों का जवाब किसने तैयार किया? योगी के ट्वीट और सरकारी उपलब्धियों को प्रचार-प्रसार का हथियार क्यों नहीं बनाया गया? पार्टी की फीडबैक प्रक्रिया में भी कार्यकर्ताओं की निराशा सामने आई है, जिसका कारण नेतृत्व और प्रशासन से उनकी उपेक्षा बताया जा रहा है.
यह विवाद सिर्फ दो नेताओं की खींचतान नहीं है. यह 2027 से पहले टिकट, नेतृत्व, जातीय समीकरण और सत्ता के नियंत्रण की लड़ाई है. पंकज चौधरी का “सामूहिक नेतृत्व” वाला बयान योगी को एकमात्र मुख्यमंत्री चेहरा मानने से इनकार जैसा पढ़ा जा रहा है. इससे संदेश निकलता है कि पार्टी 2027 के बाद के विकल्प खुले रखना चाहती है.
योगी की ओर से 2024 की गलतियों से सबक लेते हुए टिकट चयन में अपनी राय को वरीयता देने की मांग को लेकर चर्चा है. संगठन और केंद्रीय नेतृत्व चाहते हैं कि टिकट में जातीय संतुलन, नए चेहरे और पार्टी की सामूहिक सहमति भी झलके. पंकज चौधरी को पार्टी ने आंशिक रूप से ओबीसी मतदाताओं तक पहुंच बनाने और योगी के ठाकुर नेतृत्व के समीकरण को संतुलित करने के लिए चुना था. संगठन की कोशिश है कि योगी की लोकप्रियता का लाभ लिया जाए, पर साथ ही राज्य में एक वैकल्पिक सत्ता-केंद्र भी बना रहे, ताकि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद का फैसला केवल एक नेता की इच्छा पर न टिके.
बसपा का मामला देखें. मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को इसलिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया कि उन्होंने उनकी एक्स पोस्ट तक रिपोस्ट नहीं की. यह घटना व्यक्तिगत राजनीति की सीमा दिखाती है, लेकिन इसका एक बड़ा सबक भी है—जब नेतृत्व और संगठन के बीच विश्वास की कड़ी टूटती है, तो पार्टी अपने ही लोगों को दूर कर बैठती है. यूपी भाजपा में योगी के संदेशों को लगातार नजरअंदाज करना इसी तरह की दूरी का संकेत है.
आरएसएस ने साफ कहा है कि 2027 का चुनाव योगी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा और पार्टी को आपसी मतभेद भूलकर तैयारी पर ध्यान देना चाहिए. इसका मतलब है कि अभी योगी को हटाने या किनारे करने का सार्वजनिक एजेंडा नहीं है, लेकिन संगठन चाहता है कि सरकार, मंत्री, विधायक और कार्यकर्ता एक तालमेल में रहें. योगी ने असंतुष्ट नेताओं से मुलाकात शुरू कर दी है, जो दर्शाता है कि टिकट और पारिवारिक प्रतिनिधित्व को लेकर बढ़ते रोष से पार्टी चिंतित है.[
यह विवाद तब तक नुकसानदेह नहीं होगा जब तक टिकट बंटवारे में स्पष्ट समझौता हो जाए और संगठन योगी के प्रचार अभियान को पूरी तरह अपनाए. लेकिन अगर असंतोष बढ़ता रहा खासकर टिकट, नेताओं के परिवारों को मौका न मिलने और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर—तो सपा को भाजपा के भीतर की दरार को चुनावी मुद्दा बनाने का मौका मिल सकता है.
योगी अकेले जीत सकते हैं या हार सकते हैं, यह उनकी लोकप्रियता तय नहीं करेगी. तय करेगा यह कि संगठन उनके साथ मैदान में उतरा या नहीं. अगर पंकज चौधरी और धर्मपाल सिंह अपनी भूमिका से आगे नहीं बढ़े, तो हार-जीत का श्रेय या दोष दोनों ही योगी के सिर आएंगे. और यही भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. यूपी में भाजपा की जीत योगी की लोकप्रियता और संगठन की मशीनरी, दोनों के सही तालमेल पर टिकेगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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