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एक भाषा या ग्रंथ तक सीमित नहीं है भारतीय ज्ञान परंपरा: शंभुनाथ की पुस्तक में उजागर हुई सभ्यता की बहुरंगी अंतर्दृष्टि

शंभुनाथ की पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: एक सभ्यता की अंतर्दृष्टि’ के आलोक में जानिए कि कैसे भारत की ज्ञान-परंपरा संस्कृत, पालि, तमिल, लोक-कलाओं और वैचारिक बहस से समृद्ध हुई है.

Bharatiya Gyan Parampara Book Review Shambhunath Indian Knowledge System

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Edited by Vaibhav Gupta

भारतीय ज्ञान परंपरा कोई एक भाषा, एक ग्रंथ या एक विचारधारा तक सीमित नहीं है. यह एक जीवंत, बहुरंगी और निरंतर विकसित होती सभ्यता की अंतर्दृष्टि है, जो हजारों वर्षों से विचारों के संवाद, लोक अनुभव और कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से आगे बढ़ती रही है. शंभुनाथ की पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परंपरा : एक सभ्यता की अंतर्दृष्टि’ इसी दृष्टि को सामने लाती है. हमारी ज्ञान-धारा संस्कृत साहित्य से शुरू होकर पालि, प्राकृत, तमिल और तमाम लोकभाषाओं तक फैली हुई है, और नवजागरण से लेकर स्वातंत्र्योत्तर विमर्शों तक फैली हुई है.

संस्कृत साहित्य निस्संदेह भारतीय ज्ञान परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली अंग है. वेद, उपनिषद, दर्शन, काव्य और शास्त्र- ये सब हमारी सभ्यता की गहरी जड़ों को दर्शाते हैं. लेकिन संस्कृत को ही संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा का पर्याय मान लेना एकांगी और भ्रामक होगा. जैसा कि आजकल कुछ हलकों में जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है, यह धारणा सही नहीं है.

‘वादे वादे जायते तत्वबोध:’

वास्तविकता यह है कि पालि भाषा में बौद्ध त्रिपिटक और जातक कथाएं, प्राकृत में जैन आगम और साहित्य, तमिल में संगम साहित्य, तिरुक्कुरल और भक्ति परंपरा, तथा अन्य भारतीय भाषाओं में रचा गया महान साहित्य, ये सब समान रूप से हमारी ज्ञान परंपरा के अभिन्न अंग हैं.

इस परंपरा का मूल स्वर है- ‘वादे वादे जायते तत्वबोध:’. अर्थात् विभिन्न विचारों के टकराव और संवाद से ही तत्व का वास्तविक बोध होता है. भारतीय चिंतक कभी एकमत नहीं रहे. चार्वाक से लेकर बौद्ध, जैन, न्याय, सांख्य, वेदांत और भक्ति आंदोलन तक—सभी ने एक-दूसरे से बहस की, एक-दूसरे को चुनौती दी और इस प्रक्रिया में ज्ञान को समृद्ध किया. यह खुला और बहुआयामी स्वभाव ही भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है. यह एकायामी नहीं, बल्कि बहुरंगी और समावेशी है.

केवल शास्त्रों में नहीं बसता ज्ञान

यह परंपरा केवल प्राचीन ग्रंथों तक सीमित नहीं रही. उन्नीसवीं शताब्दी के नवजागरण में राजाराममोहन राय, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा फुले और अन्य विचारकों ने प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्यायित किया. राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में गांधी, तिलक, अरविंद, टैगोर और अंबेडकर जैसे चिंतकों ने ज्ञान को स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय से जोड़ा. स्वातंत्र्योत्तर काल में भी दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, पर्यावरणीय चिंतन और क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य ने इस परंपरा को नए आयाम दिए.

ज्ञान केवल शास्त्रों में नहीं बसता. लोकभाषाओं का महान साहित्य- कबीर, तुलसी, मीरा, रैदास, बसवन्ना, नामदेव, सूरदास और अनगिनत लोककवियों की वाणी हमारी ज्ञान परंपरा का जीवंत हिस्सा है. इसके अलावा मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्य और लोक जैसी विभिन्न कलाएं भी ज्ञान को अभिव्यक्त करती हैं. प्राचीन मंदिरों की मूर्तियां, अजंता-एलोरा की चित्रकला, भरतनाट्यम से लेकर कथकली तक का नृत्य, और लोकगीतों की परंपरा, ये सब मौखिक और दृश्य रूप में ज्ञान को सहेजते और प्रसारित करते रहे हैं.

यह किताब किस व्यापक दृष्टि को करती है उजागर?

आज जब वैश्विक स्तर पर ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ की चर्चा हो रही है, तब हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हम इसे किसी एक भाषा या किसी एक विचारधारा तक सीमित न कर दें. सच्ची भारतीय ज्ञान परंपरा वह है जो संवाद को प्रोत्साहित करे, विविधता को स्वीकार करे और लोक अनुभव को सम्मान दे. शंभुनाथ की पुस्तक इसी व्यापक और लोकतांत्रिक दृष्टि को रेखांकित करती है.

अंत में, भारतीय ज्ञान परंपरा कोई मृत संग्रहालय नहीं है. यह एक जीवित नदी है, जो समय-समय पर नई धाराएं ग्रहण करती रही है और करती रहेगी. इसकी असली शक्ति विचारों के टकराव में, भाषाओं की बहुलता में और कलाओं की अभिव्यक्ति में निहित है. यही इसकी अंतर्दृष्टि है- एक ऐसी सभ्यता की, जो एक होकर भी अनेक है, और अनेक होकर भी एक.

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-भारत एक्सप्रेस



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