Book Review: आज, 22 दिसंबर, जब हम विलक्षण गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिन पर उनकी स्मृति को नमन कर रहे हैं, तो ‘विनम्र विद्रोही’ जैसी पुस्तक पढ़ना एक सुखद संयोग बन जाता है. मेहर वान और भारती राठौड़ द्वारा रचित यह जीवनी, रामानुजन की अद्भुत प्रतिभा को न केवल उजागर करती है, बल्कि उनके जीवन की उन अनकही त्रासदियों को भी सामने लाती है, जो एक सामान्य व्यक्ति के लिए अभिशाप सिद्ध हुईं. हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित यह 242 पृष्ठों की पुस्तक, रामानुजन के जीवन को एक रोचक उपन्यास की तरह बुनती है, जिसमें गणित के सूत्रों की जादुई चमक के साथ-साथ सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत संघर्षों की कड़वाहट भी घुली हुई है.
शुरूआत के कुछ पन्ने
पुस्तक रामानुजन के सरल ब्राह्मण परिवार में जन्म से शुरू होती है, जहां एक गरीब दक्षिण भारतीय गांव में पैदा हुआ लड़का, बिना किसी औपचारिक शिक्षा के, गणित के रहस्यों को देवी की कृपा मानकर खोजने लगता है. लेखिकाएं उनकी यात्रा को जीवंत बनाती हैं की कैसे रामानुजन ने ‘नोटबुक’ में हजारों सूत्रों को उकेरा?. कैसे उन्होंने जी.एच. हार्डी जैसे ब्रिटिश गणितज्ञ को चिट्ठी लिखी, और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पहुंचकर दुनिया को चौंका दिया. यह मात्र एक जीवनी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा की कहानी है, जो बताती है कि कैसे एक ‘अद्वितीय गणितज्ञ’ ने नंबर थ्योरी, अनंत श्रृंखलाओं और मॉड्यूलर फॉर्म्स जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला दी.
समय से पहले मृत्यु
पुस्तक की असली ताकत इसकी भावनात्मक गहराई में है. रामानुजन का ‘विनम्र विद्रोही’ होना, जो देवी नमागिरि की भक्ति में डूबा था. लेकिन औपनिवेशिक भारत की कठोर वास्तविकताओं से जूझता रहा, यहां खूबसूरती से चित्रित है. उनकी शादी, बीमारी, नस्लीय भेदभाव और समय से पहले मृत्यु (32 वर्ष की आयु में) जैसी घटनाएं पाठक को भावुक कर देती हैं. लेखिकाओं का कहना सही है कि “विलक्षण प्रतिभा होना एक त्रासदी है,” क्योंकि रामानुजन की उपलब्धियां उनकी पीड़ाओं की छाया में दबकर रह जाती हैं.
सरल और प्रवाहमयी भाषा
भाषा की दृष्टि से, यह पुस्तक सरल और प्रवाहमयी है, जो गणित के जटिल सिद्धांतों को भी आम पाठक के लिए सुलभ बनाती है. कोई भारी-भरकम फॉर्मूले नहीं, बल्कि कहानी का प्रवाह जो आपको अंत तक बांधे रखता है. हालांकि, कुछ जगहों पर ऐतिहासिक संदर्भ थोड़े संक्षिप्त लगते हैं, जैसे रामानुजन के योगदानों का गहरा विश्लेषण न होना, जो उन्नत पाठकों के लिए कमी हो सकती है. फिर भी, यह एक ऐसी किताब है जो रामानुजन को ‘मानव’ के रूप में जीवंत करती है, न कि सिर्फ एक ‘गणितीय मिथक’ के रूप में.
रामानुजन के जन्मदिन पर, ‘विनम्र विद्रोही’ पढ़ना न केवल उनकी स्मृति को ताजा करता है, बल्कि हमें सिखाता है कि सच्ची प्रतिभा विद्रोह की आग में तपती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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