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रील्स की रंगीन दुनिया, बच्चों का बचपन कर रही तबाह; कहीं आपका लाडला भी तो नहीं हो रहा ‘डोपामाइन’ की लत का शिकार?

सोशल मीडिया और रील्स बच्चों का बचपन छीन रहे हैं, नींद, ब्रेन और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर बढ़ रहा है.

रिपोर्ट: रमेश कुमार सिंह, भारत एक्सप्रेस दिल्ली ब्यूरो


आज के बच्चे मैदानों और खेल-कूद से दूर, स्मार्टफोन और रील्स की दुनिया में फंसते जा रहे हैं. अब उनका बचपन चारदीवारी में सिमट गया है. 10-15 सेकेंड के शॉर्ट वीडियो ही उनकी असली दुनिया बन गए हैं. ये रंगीन दुनिया जितनी आकर्षक है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक भी है.

रील्स की लत और इसके कारण

रील्स सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि एक लत बन चुके हैं. बच्चों को बार-बार वीडियो देखने की आदत डोपामाइन हार्मोन के कारण होती है. यह हार्मोन उन्हें खुशी और संतोष का झूठा अहसास दिलाता है, जिससे बच्चे बार-बार स्क्रीन पर चिपके रहते हैं.

मानसिक और शारीरिक प्रभाव

सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों और युवाओं में डिप्रेशन, ध्यान की कमी, और तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. इसके अलावा नींद में कमी और ब्रेन के सामान्य विकास पर भी गंभीर असर पड़ रहा है. नींद की कमी से बच्चों की पढ़ाई, ध्यान और याददाश्त प्रभावित होती है.

परिवार और सामाजिक असर

सोशल मीडिया की लत सिर्फ व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है, यह पूरे परिवार और समाज को प्रभावित कर रही है. माता-पिता के समय की कमी और डिजिटल दुनिया का आकर्षण बच्चों को असली दुनिया से दूर कर रहा है.

समाधान और बचाव

बच्चों को डिजिटल दुनिया से दूर रखने के लिए माता-पिता को समय देना होगा. स्क्रीन टाइम को सीमित करना, खेल-कूद और किताबों की ओर बच्चों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है. रील्स और शॉर्ट वीडियो को संतुलित तरीके से ही इस्तेमाल करना बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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