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बाल उगाने की गारंटी बेच रहीं कंपनियां, 90% बाल उगाने वाली कंपनियों के दावे हुए झूठे साबित

ASCI की रिपोर्ट के अनुसार, ₹17,000 करोड़ के हेयर-केयर बाजार में 90% विज्ञापनों के दावे भ्रामक पाए गए. 48 घंटे में बाल झड़ना रोकने और 90 दिन में नए बाल उगाने जैसे दावों पर नियामक ने कड़ी आपत्ति जताई है.

ASCI Questions 90 Percent Misleading Hair Care Advertisements Claims
Edited by Vaibhav Gupta

सिर पर बाल कम होते ही चिंता बढ़ती है और इसी चिंता को बाजार ने कमाई का बड़ा जरिया बना लिया है. बाल झड़ने से परेशान लोगों को लुभाने के लिए कंपनियां हेयर ऑयल, सीरम, शैंपू, सप्लीमेंट, ट्रीटमेंट किट से लेकर हेयर ट्रांसप्लांट तक के विज्ञापनों में ऐसे दावे कर रही हैं, जिनमें बेहद कम समय में नतीजे देने का भरोसा दिया जाता है. कहीं 48 घंटे में हेयरफॉल रोकने की बात है तो कहीं 90 दिन में नए बाल उगाने का दावा किया जा रहा है. लेकिन इन दावों की हकीकत पर सवाल खड़े हो गए हैं.

विज्ञापनों की निगरानी करने वाली Advertising Standards Council of India (ASCI) की 2025-26 की समीक्षा में पर्सनल केयर से जुड़े 639 मामलों की जांच की गई. इनमें करीब 90 फीसदी मामलों में विज्ञापनों में बदलाव की जरूरत सामने आई. यानी बालों से जुड़े उत्पादों के विज्ञापन जिस तेजी और निश्चितता से नतीजे देने का दावा करते हैं, उनके दावों को लेकर नियामक स्तर पर गंभीर आपत्तियां हैं.

बाल झड़ने की समस्या को लेकर बाजार में सबसे ज्यादा आकर्षण उन दावों का है जो तत्काल या बेहद कम समय में परिणाम का भरोसा देते हैं. एक मामले में हेयरफॉल कंट्रोल किट के विज्ञापन में 48 घंटे में बाल झड़ना नियंत्रित करने और 90 दिन में बाल उगाने का दावा किया गया.

विज्ञापन को लेकर आपत्ति दर्ज

ऐसे दावों पर सवाल इसलिए गंभीर हैं क्योंकि विज्ञापन उपभोक्ता को यह संदेश देता है कि समस्या का समाधान बेहद आसान और तेज है. लेकिन जांच के दौरान दावे के समर्थन में पर्याप्त आधार नहीं मिलने पर विज्ञापन को लेकर आपत्ति दर्ज की गई.

सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को महीनों या वर्षों से बाल झड़ने की समस्या है, उसे क्या वाकई कुछ ही दिनों में समाधान मिल सकता है? और अगर किसी कंपनी का दावा इतना बड़ा है तो उसके समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण कितने मजबूत हैं?

बालों की देखभाल और बाल उगाने से जुड़े उत्पादों का बाजार करीब 17 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. बाजार जितना बड़ा है, उपभोक्ताओं को आकर्षित करने की होड़ भी उतनी ही तेज है.

ASCI की समीक्षा से खड़े हुए सवाल

कंपनियां जानती हैं कि बालों का झड़ना सिर्फ शारीरिक समस्या नहीं है. इसका सीधा असर व्यक्ति के आत्मविश्वास और सामाजिक छवि पर पड़ता है. यही वजह है कि विज्ञापनों में अक्सर पहले और बाद की तस्वीरें, तेजी से परिणाम और आकर्षक वादों का इस्तेमाल किया जाता है.

ऐसे में उपभोक्ता के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि विज्ञापन में दिखाया गया परिणाम वास्तविक वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित है या सिर्फ उत्पाद बेचने की रणनीति है. ASCI की समीक्षा में सामने आया आंकड़ा इस पूरे कारोबार पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. 639 मामलों में करीब 90 फीसदी विज्ञापनों में बदलाव की जरूरत बताई गई.

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कर रहे प्रमोट

इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि बाजार में मौजूद सभी हेयर-केयर उत्पाद बेअसर हैं. लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि विज्ञापनों में किए जा रहे दावों की भाषा, प्रमाण और प्रस्तुति को लेकर बड़ी संख्या में आपत्तियां सामने आ रही हैं. यानी उपभोक्ता को उत्पाद खरीदने से पहले सिर्फ विज्ञापन पर भरोसा करने के बजाय उसके दावे की वास्तविकता भी जांचनी चाहिए.

बाल उगाने और हेयर ट्रीटमेंट का कारोबार अब पारंपरिक विज्ञापनों तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी इन उत्पादों और उपचारों को प्रमोट कर रहे हैं.

हेयर ट्रांसप्लांट जैसे दावे भी शामिल

समीक्षा में सामने आए प्रमुख मामलों में करीब 45 फीसदी आपत्तियां इन्फ्लुएंसर विज्ञापनों से जुड़ी थीं. इनमें हेयर ट्रीटमेंट और हेयर ट्रांसप्लांट जैसे दावे भी शामिल रहे.

इन्फ्लुएंसर की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्यक्तिगत कहानी होती है. जब कोई व्यक्ति कैमरे के सामने अपना अनुभव बताता है तो उपभोक्ता उसे सामान्य विज्ञापन की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय मान सकता है.

लेकिन किसी एक व्यक्ति का अनुभव हर व्यक्ति के लिए समान परिणाम की गारंटी नहीं होता. मामले सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित नहीं हैं. उपभोक्ताओं को अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च करने के बाद शिकायत लेकर सामने भी आना पड़ा है.

अहमदाबाद के एक मामले में एक उपभोक्ता ने बालों के उपचार पर करीब 53 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद शिकायत की. मामले में उपभोक्ता को रकम लौटाने के साथ 40 हजार रुपये मुआवजा दिए जाने का उल्लेख है.

उपभोक्ता को वास्तविक आर्थिक नुकसान

एक दूसरे मामले में 55 हजार रुपये लेकर हेयर ट्रांसप्लांट के बजाय विग देने की शिकायत सामने आई. ऐसे मामलों से पता चलता है कि आकर्षक दावों का असर सिर्फ खरीदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उपभोक्ता को वास्तविक आर्थिक नुकसान भी हो सकता है.

बाल झड़ने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं. उम्र, आनुवंशिक कारण, हार्मोनल बदलाव, पोषण, तनाव और कई अन्य कारक इसकी वजह हो सकते हैं. इसलिए हर व्यक्ति में एक ही उत्पाद या उपचार का परिणाम समान हो, यह जरूरी नहीं.

इसके बावजूद बाजार में ऐसे संदेशों की भरमार है जो समस्या का तत्काल समाधान देने का भरोसा पैदा करते हैं. यही वजह है कि विशेषज्ञों और विज्ञापन निगरानी संस्थाओं की आपत्तियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं. उपभोक्ता को यह पता होना चाहिए कि ‘गारंटी’, ‘क्लिनिकली प्रूव्ड’, ‘90 दिन में बाल’, ‘48 घंटे में हेयरफॉल कंट्रोल’ जैसे शब्दों के पीछे वास्तविक प्रमाण क्या है.

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-भारत एक्सप्रेस



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