JP Jayanti: जयप्रकाश नारायण को देश लोकनायक के नाम से जानता है. आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. 11 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं बल्कि उनके विचारों और संघर्षों को फिर से समझने का मौका है. लोकनायक ने न केवल आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया बल्कि आजादी के बाद भी जब देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ा तब उन्होंने संपूर्ण क्रांति का नारा देकर इंदिरा गांधी की सरकार को हिला कर रख दिया था.
राजनीति से दूरी
जेपी ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा और ना ही किसी सरकार का हिस्सा बने. 1950 के दशक में ही उन्होंने दलीय राजनीति से खुद को अलग कर लिया था. उनका मानना था कि सत्ता में रहकर व्यवस्था में बदलाव करना संभव नहीं है. उन्होंने सर्वोदय आंदोलन, डाकुओं के आत्मसमर्पण, हिंद-पाक शांति प्रयास और पूर्वोतर में शांति स्थापना जैसे कई सामाजिक कार्यों में खुद को झोंक दिया था.
संपूर्ण क्रांति की शुरुआत
1974 में जब बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हुआ तब जेपी बिमार थे लेकिन जब छात्रों पर पुलिस की गोलीबारी में कई जानें गईं जिसके बाद उन्होंने आंदोलन की कमान संभालने का फैसला किया. 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का ऐसान किया. उनका भाषण “यह क्रांति है दोस्तों, संपूर्ण क्रांति है” आज भी लोगों के दिलों में गूंजता है.
इमरजेंसी और जेपी की गिरफ्तारी
जेपी के नेतृत्व में आंदोलन ने पूरे देश में आग की तरह फैल गया. इंदिरा गांधी की सरकार पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा और 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी गई. उसी रात जेपी समेत हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. देश खुली जेल बन गया. अभिव्यक्ति की आजादी पर ताले लग गए. जेल में जेपी की तबीयत और बिगड़ गई लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा.
1977 की जीत और जेपी की निराशा
आपातकाल के बाद जब 1977 में चुनाव हुए तो जेपी ने विपक्ष को एकजुट कर जनता पार्टी का गठन कराया. यह पार्टी सत्ता में आई लेकिन जल्द ही आपसी मतभेदों के कारण पार्टी टूट भी गई. जेपी ने निराश होकर कहा “जनता पार्टी की सरकार भी कांग्रेस के रास्ते पर चल रही है.” सत्ता के लिए हो रही आपसी खींचतान ने उन्हें दुखी कर दिया.
जेपी आंदोलन की विरासत
जेपी आंदोलन से निकले नेता आज भी भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और स्वर्गीय सुशील मोदी जैसे नेता उसी आंदोलन की उपज हैं. लेकिन आज जब बिहार में चुनावी में माहौल है तब जेपी के विचारों और उनके नाम का जिक्र तक नहीं होता है. विडंबना देखिए कि जिनके कंधों पर चढ़कर कई नेता सत्ता तक पहुंचे आज वही जेपी हाशिए पर हैं.
इंदिरा गांधी से मतभेद
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेपी हजारीबाग जेल से भाग निकले थे और गुप्त आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने नेपाल में ठिकाना बनाकर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. गांधीजी ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा की, लेकिन हिंसक प्रयास से दुखी थे. जिसपर जेपी ने कहा था
“महात्मा गांधी के सामने मेरा सिर झुकता है लेकिन उनके जैसा आत्मबल मेरे पास नहीं है.”
दिनकर की कविता में अमर हुए जेपी
जेपी की रिहाई के बाद 11 अप्रैल 1946 को पटना के गांधी मैदान में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें समर्पित कविता पढ़ी उसमें लिखा था,
“कहते हैं उसको जयप्रकाश जो नहीं मरण से डरता है,
ज्वाला को बुझते देख कुंड में, स्वयं कूद जो पड़ता है.”
इसे भी पढ़ें-नॉट रिचेबल हुए मुकेश सहनी, डिप्टी CM पद और 60 सीटों की मांग पर अड़े VIP प्रमुख ने महागठबंधन नेताओं से काटा संपर्क
निष्कर्ष
जयप्रकाश नारायण का जीवन सत्ता की नहीं बल्कि सेवा की कहानी है. उन्होंने दिखाया कि बिना पद और सत्ता के भी कोई व्यक्ति देश की दिशा बदल सकता है. आज जब राजनीति में मूल्यों की बात कम होती जा रही है तब जेपी जैसे नेताओं की याद और भी जरूरी हो जाती है.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.





