West Bengal Politics Update: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक बड़े भूचाल और संभावित टूट के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं. सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर लगातार गहराते अंदरूनी असंतोष के बीच दिल्ली के संसदीय गलियारों में घटी दो बड़ी घटनाओं ने पूरे देश के सियासी पारे को चढ़ा दिया है. पहली घटना संसद की कैंटीन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ TMC के दिग्गज सांसदों की दोपहर के भोजन की वायरल तस्वीर और दूसरी एनडीए (NDA) की ‘मंगल मिलन’ बैठक से बागी गुट के तीन सांसदों का अचानक नदारद होना.
इन दोनों परिदृश्यों ने एक नया राजनीतिक गणित जन्म दिया है, जिसे सियासी गलियारों में “+3-2=1” का समीकरण कहा जाने लगा है. क्या यह फॉर्मूला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक और सियासी झटका देने जा रहा है या फिर बागी नेताओं के सहारे उभरी नई राजनीतिक व्यवस्था खुद अपनी ही खटाई में पड़ने वाली है?
कैंटीन में पर्दे के पीछे की खिचड़ी? (West Bengal Politics In Delhi)
संसद परिसर की कैंटीन में उस वक्त सभी की निगाहें टिक गईं, जब TMC के दो बेहद वरिष्ठ और ममता बनर्जी के सबसे वफादार माने जाने वाले सांसद सौगत रॉय और आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा एक ही टेबल पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के साथ खाना खाते नजर आए. तस्वीरों के सार्वजनिक होते ही यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या टीएमसी में कोई और बड़ी बगावत पक रही है या ये दिग्गज़ किसी नए राजनीतिक मोड़ की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.
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हालांकि, इस मुलाकात पर सफाई देते हुए तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं और खुद सांसदों ने कहा कि यह केवल एक सामाजिक और शिष्टाचार भेट थी. शत्रुघ्न सिन्हा ने जेपी नड्डा को अपना पुराना मित्र बताते हुए किसी भी राजनीतिक अर्थ से इनकार किया, तो वहीं सौगत रॉय ने स्पष्ट किया कि टेबल पर कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हुई. लेकिन पार्टी के भीतर से ही सांसद काकोली घोष दस्तीदार के उस बयान ने हलचल बढ़ा दी, जिसमें उन्होंने इसे “डबल ट्रैक रणनीति” का हिस्सा होने की संभावना जताई.
NDA की बैठक 3 सांसदों की गैरमौजूदगी (NDA Mangal Milan West Bengal Politics)
सियासी ड्रामे का दूसरा पहलू तब देखने को मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुलाई गई एनडीए सांसदों की ‘मंगल मिलन’ बैठक से बागी गुट के तीन प्रमुख मुस्लिम सांसद यूसुफ पठान, अबू ताहेर खान और खलीलुर रहमान अनुपस्थित रहे. हालांकि इस बैठक में टीएमसी से बगावत कर अलग राह चुनने वाले बागी गुट के कई अन्य सांसदों को आमंत्रित किया गया था.
संसद में मौजूद होने के बावजूद इन तीनों सांसदों की गैरमौजूदगी ने नए कयासों को जन्म दे दिया है. सौगत रॉय ने दावा किया कि ये सांसद एनडीए की विचारधारा से सहज महसूस नहीं कर रहे हैं और ममता बनर्जी के मूल खेमे में वापस लौटने के रास्ते तलाश रहे हैं. उन्होंने यहाँ तक कहा कि यदि ये सांसद औपचारिक आवेदन देते हैं, तो तृणमूल नेतृत्व उनकी वापसी पर सकारात्मक विचार कर सकता है.
दलबदल की खबरों पर NCPI की सख्त सफाई
तृणमूल से अलग होकर एनडीए को समर्थन देने वाले बागी सांसदों के गुट, जिसे नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के नाम से जाना जा रहा है, ने पार्टी में किसी भी तरह के मतभेद या सांसदों की नाराजगी की खबरों का पुरजोर खंडन किया है. पार्टी नेतृत्व की ओर से जारी आधिकारिक सफाई में कहा गया है कि आंतरिक विवाद और तीन सांसदों के अलग-अलग रुख अपनाने से जुड़ी खबरें पूरी तरह से “झूठी, भ्रामक और बिना किसी तथ्यात्मक आधार” के हैं. NCPI ने दावा किया कि उनके सभी सांसद पूरी तरह से एकजुट हैं और वे पश्चिम बंगाल के समग्र विकास, जनकल्याण और राष्ट्रीय हित के लिए पूरी निष्ठा के साथ समर्पित हैं.
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अयोग्यता की मांग पर अड़ी TMC
इस पूरे सियासी उठापटक के बीच तृणमूल कांग्रेस ने बागी गुट पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी और प्रवक्ता कुणाल घोष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत उन बागी सांसदों को तुरंत अयोग्य घोषित करने की मांग उठाई है, जो टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर जीतकर आए थे लेकिन अब एनडीए खेमे के साथ खड़े हैं. संसद के बाहर कल्याण बनर्जी द्वारा सांकेतिक विरोध प्रदर्शन और कुणाल घोष के तीखे बयानों से साफ है कि तृणमूल इस बगावत को कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर चुनौती देने के मूड में है.
कौन मारेगा बाजी और किसकी पड़ेगी खटाई? (West Bengal Political Update)
संसद कैंटीन की तस्वीरें और एनडीए बैठक से तीन सांसदों की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि पश्चिम बंगाल का राजनीतिक ड्रामा अब अपने सबसे दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है. यदि बागी सांसदों का एक धड़ा (+3) वापस मूल तृणमूल कांग्रेस की तरफ रुख करता है और दूसरी तरफ वरिष्ठ नेताओं की संदेहास्पद मुलाकातों (-1) से नया गणित बनता है, तो यह संपूर्ण “+3-2=1” का समीकरण किसी के लिए संजीवनी तो किसी के लिए बड़ी राजनीतिक खटाई साबित हो सकता है यह देखना बेहद दिलचस्प होगा?
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