Barood Ki Holi Rajasthan: आपने अबीर-गुलाल से होली खेली होगी, रंगों से होली खेली होगी, फूलों से भी होली खेली होगी, लेकिन क्या आपने कभी बारूद की होली खेली है. राजस्थान में एक ऐसा गांव है जहां लोग बारूद की होली खेलते हैं. ये कौन सा गांव है और यहां लोग बारूद की होली क्यों खेलते हैं? आइये बताते हैं.
राजस्थान का नाम सुनते ही मन में राजपूतों की वीरता, किले और रेगिस्तान की तस्वीर उभरने लगती है. मेवाड़ के राणा प्रताप की कहानी कौन नहीं जानता, जिन्होंने अपने शौर्य से मुगल बादशाह अकबर को नाको चने चबवा दिया था. मेवाड़ का इतिहास राणाओं का इतिहास कहा जाता है, लेकिन इन सबके बीच एक वाकया ऐसा भी आता है जब ब्राह्मणों ने अपने बहादुरी से मुगलों को परास्त कर दिया था. जिस दिन उन्होंने मुगलों पर ये ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी वो होली के बाद का दिन था. ब्राह्मणों की इस जीत के बाद उन्हें ब्रह्मक्षत्रिय कहा जाता है. उस जीत के बाद पिछले लगभग 400 सालों से वहां के ब्राह्मण समाज बारूद की होली खेलता आ रहा है.
उदयपुर के मेनार गांव में होती है ये होली
यह जगह उदयपुर के मेनार (Menar)गांव में मौजूद है. जहां रहने वाले मेनारिया ब्राह्मण समाज होली के अगले दिन यानी धुलेंडी के बाद “बारूद की होली” खेलता है. वहां इसे जमरा बीज परंपरा कहा जाता है. इस दिन गांव के ब्राह्मण समाज बंदूकों, तोपों और पटाखों से हवाई फायरिंग करते हैं, तलवारे लहराते हैं. पूरा नजारा ऐसा लगता है जैसे कोई युद्ध हो रहा हो. इस दिन रातभर धमाके और गोलियां चलती हैं.
This is Holi, Not Diwali.
Happy Holi Menaria brahmins. pic.twitter.com/NchH93GNAn— Voice Of Brahmins (@VoiceOfBrahmins) March 24, 2024
मेनारिया ब्राह्मण यह “जमरा बीज परंपरा” अपने पूर्वजों की ऐतिहासिक जीत के रूप में मनाते हैं. जो मेवाड़ क्षेत्र की वीरता और शौर्य से जुड़ी हुई है. यह परंपरा पिछले 400 सालों से चली आ रही है. इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते हैं.
उदयपुर का मेनार गांव में जमरा बीज (Jamra Beej) की यह परंपरा 400 साल से ज्यादा पुरानी है. यह मेनारिया ब्राह्मण समाज की शौर्यगाथा है. जिन्हें स्थानीय रूप से ब्रह्मक्षत्रिय कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ब्राह्मण होने के बावजूद युद्ध में हिस्सा लिया था.
क्या है इसका इतिहास?
लगभग 1600 ईस्वी में मेवाड़ पर महाराणा प्रताप के पुत्र महाराणा अमर सिंह प्रथम का शासन था. उस समय दिल्ली की गद्दी पर मुगल सम्राट अकबर बैठा था. जहां से उसकी सेना लगातार मेवाड़ पर आक्रमण करती रहती थी. मुगलों ने मेवाड़ के कई क्षेत्रों में चौकियां भी स्थापित कर ली थीं, जिसमें से एक चौकी मेनार गांव के पास पूर्व की दिशा में मौजूद थी. इस चौकी में रहने वाले मुगल सैनिक आसपास के ग्रामीणों पर लगातार अत्याचार करते रहते थे. यहां से वे मेवाड़ पर आक्रमण की योजना बनाते थे. इनसे मेनार गांव के ब्राह्मण बेहद परेशान हो गए थे.
इसी समय महाराणा अमर सिंह ने मुगलों पर वल्लभनगर और ऊंठाला दुर्ग को लेकर हुए युद्धों में विजय प्राप्त की. जिनसे प्रेरित होकर मेनार के ब्राह्मणों ने एक गोपनीय बैठक की. यह बैठक गांव में मौजूद ओंकारेश्वर महादेव चबूतरे पर हुई थी. जिसमें यह तय किया गया कि होली के दूसरे दिन यानी धुलेंडी के बाद जमरा बीज के दिन वो मुगल चौकी पर आक्रमण करेंगे.
ब्राह्मणों ने मुगलों को कर दिया परास्त
होली बीतती है और जमरा बीज का दिन आ जाता है. रात के समय मेनारिया ब्राह्मण समाज, हाथों में तलवार और बंदूकों से सुसज्जित होकर मुगल चौकी पर टूट पड़े. उस रात दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ. इस युद्ध में कई मेनारिया ब्राह्मण वीरों ने वीरगति प्राप्त की. सुबह होते-होते मुगल चौकी पूरी तरह से नष्ट हो गई. कई मुगल सैनिक मारे गए और कई जान बचाकर भाग खड़े हुए.
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मेनारिया ब्राह्मणों की इस जीत से प्रभावित होकर महाराणा अमर सिंह ने उन्हें विशेष सम्मान दिया. उन्होंने ब्राह्मणों को शाही लाल जाजम, रणबांकुरा ढोल और बांकिया, सिर पर कलंगी (कलगी) धारण करने का अधिकार, ठाकुर या मेहता पदवी और 52,000 बीघा भूमि दान किया.
इस जीत का जश्न मेनारिया ब्राह्मण समाज आज 400 सालों के बाद भी मनाता है. इस दिन वो बंदूकों, पटाखों और तोपों से फायरिंग करते हैं और मुगलों पर पूर्वजों की जीत का जश्न मनाते हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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